लखनऊ इस्कॉन मंदिर में सोमवार को वैष्णव आचार्य परंपरा के महान संत श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज का तिरोभाव दिवस श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भक्तों ने हरिनाम संकीर्तन किया, पुष्पांजलि अर्पित की और गुरु-वंदना कर उनके जीवन आदर्शों को स्मरण किया। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज का जन्म 1874 में जगन्नाथ पुरी में हुआ था। वे श्री चैतन्य महाप्रभु की शिष्य परंपरा में प्रतिष्ठित भक्तिविनोद ठाकुर के पुत्र थे। बचपन से ही वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे; उन्होंने सात वर्ष की आयु में श्रीमद्भगवद-गीता के 700 संस्कृत श्लोक कंठस्थ कर लिए थे। भक्ति-प्रचार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया संस्कृत, गणित और खगोल/ज्योतिष शास्त्र में उनकी गहरी विद्वत्ता थी। ‘सूर्य-सिद्धांत’ पर उनके शोध के प्रकाशन के बाद उन्हें ‘सिद्धांत सरस्वती’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।वर्ष 1905 में उन्होंने गौरकिशोर दास बाबा से दीक्षा ली और भक्ति-प्रचार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। 1918 में संन्यास ग्रहण करने के बाद, उन्होंने देशभर में 64 गौड़ीय मठों की स्थापना की और श्रीधाम मायापुर को अपने प्रचार आंदोलन का केंद्र बनाया। 1937 को भगवद्धाम में विलीन हो गए वैष्णव दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने मुद्रण-यंत्र को सर्वोत्तम साधन माना। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘भागवत प्रेस’ और ‘सज्जन-तोषणी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया।इस्कॉन के संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद उनके प्रमुख शिष्य थे, जिन्होंने गुरु के आदेश को वैश्विक स्तर पर प्रचारित किया। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज 01 जनवरी 1937 को भगवद्धाम में विलीन हो गए। इस्कॉन लखनऊ में भक्तों ने उनके अतुलनीय योगदान को याद करते हुए वैष्णव परंपरा की सेवा का संकल्प लिया।