गंगा नदी की अविरलता और निर्मलता कानपुर आते ही बिगड़ रही है। देश के लोगों के लिए आस्था का केंद्र मानी जाने वाली गंगा नदी कानपुर में सबसे ज्यादा मैली है। जाजमऊ में गंगा के भीतर डाल्फिन का शव मिलने के बाद गंगा प्रदूषण पर सवाल उठ रहे हैं। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) की रिपोर्ट के अनुसार जिले के विभिन्न घाटों और मॉनिटरिंग पॉइंट्स पर गंगा का पानी ‘डी’ श्रेणी में पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब है कि यहां का गंगाजल न तो पीने योग्य है, न ही आचमन (धार्मिक उपयोग) के लायक रह गया है। यह स्थिति तब है जब हजारों करोड़ रुपये की ‘नमामि गंगे’ परियोजना के तहत नदी को स्वच्छ करने का प्रयास जारी है। जबकि कानपुर से पहले कन्नौज व फतेहपुर में गंगा सी कैटेगरी में है। इसका मतलब है कि यहां का गंगा जल कानपुर की अपेक्षा शुद्ध है। कन्नौज और फतेहपुर में सी कैटेगरी
यूपीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार कानपुर से ठीक पहले, कन्नौज (अपस्ट्रीम) और फर्रुखाबाद में गंगा का पानी ‘सी’ श्रेणी में था। जो सीमित स्तर पर स्नान के लिए उपयुक्त मानी जाती है। लेकिन जैसे ही गंगा कानपुर में प्रवेश करती है, उसका स्वरूप बदल जाता है। कन्नौज डाउनस्ट्रीम, नानामऊ गंगा पुल, बिठूर, शुक्लागंज (अपस्ट्रीम), भैरवघाट, गोलाघाट, जाजमऊ पुल और पुराना राजापुर – ये सभी स्थान ‘डी’ श्रेणी में दर्ज किए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि जैसे ही गंगा का पानी कानपुर की सीमा पार कर फतेहपुर के महेश्वर बाबा मंदिर पहुंचता है, वह फिर से सी श्रेणी में लौट आता है। यह स्पष्ट संकेत है कि प्रदूषण का केंद्र कानपुर शहर ही है। टेनरी वेस्ट और नाले कर गंगा को गंदा
पर्यावरणविदों और अधिकारियों का मानना है कि गंगा को प्रदूषित करने में सबसे बड़ा हाथ यहां की चमड़ा उद्योग (टेनरी) की इकाइयों और शहर के अनुपचारित गंदे पानी (सीवेज) का है। सैकड़ों छोटे-बड़े नाले सीधे गंगा में गिरते हैं, जिनमें औद्योगिक कचरा और घरेलू मल मिला होता है। टेनरियों से निकलने वाले केमिकल और विषैले अपशिष्ट नदी के पानी को जहरीला बना रहे हैं। कुछ इस तरह मैली है गंगा
रिपोर्ट में सामने आया है कि गंगा में डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर कम हो गया है। डीओ जलीय जीवों के जीवन का आधार है। इसके कम होने से जलीय जीव सांस नहीं ले पा रहे हैं, जिससे उनकी मौत हो रही है और पारिस्थितिकी तंत्र चरमरा रहा है। वहीं, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) का स्तर बढ़ा हुआ है, जो पानी में मौजूद जैविक गंदगी (कार्बनिक पदार्थों) की मात्रा बताता है। बीओडी जितना अधिक होगा, पानी उतना ही प्रदूषित माना जाएगा। सबसे ज्यादा शर्मनाक संकेत फीकल कोलीफॉर्म (एफसी) और टोटल कोलीफॉर्म (टीसी) के स्तर से मिलता है। इनका बढ़ा हुआ स्तर साबित करता है कि गंगा में मानव एवं पशु मल का प्रवाह बड़े पैमाने पर हो रहा है। यह न केवल पर्यावरण, बल्कि सीधे तौर पर नदी में स्नान करने वाले लाखों श्रद्धालुओं और आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। नमामि गंगे पर बड़ा सवाल यह स्थिति ‘नमामि गंगे’ जैसी महत्वाकांक्षी केन्द्रीय योजना पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। साफ है कि केवल पैसा लगाने और कुछ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाने भर से समस्या का समाधान नहीं हो रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि कानपुर में मौजूदा एसटीपी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे। औद्योगिक इकाइयों, विशेषकर टेनरियों, पर कड़ी निगरानी और उन्हें शून्य अपशिष्ट निर्वहन के लिए बाध्य करने की दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही। अनट्रिटेट सीवेज हो सकता कारण गंगा प्रदूषण पर एक्सपर्ट ने भी माना है कि कहीं न कहीं गंगा में प्रदूषित पानी जा रहा है जो कि गंगा को मैली कर रहा है। डॉ. महेंद्र कुमार सविता ने बताया कि गंगा का डी कैटेगरी में होने के कारणों में अनट्रिटेट सीवेज वाटर का गंगा में गिरना हो सकता है। रिपोर्ट में टोटल व फीकल कोलीफार्म का अधिक मात्रा में होना बता रहा है कि इसमें कहीं न कहीं मल की उपस्थिति है। इसके अलावा गंगा में यदि अनट्रिटेट टेनरी का वेस्ट वाटर जाएगा तो वह भी बीओडी व डीओ को बढ़ाएगा।