उत्तर प्रदेश की मिट्टी ने सिर्फ फसलें नहीं, फौलादी नेता भी पैदा किए हैं। उन्हीं में एक नाम है मुलायम सिंह यादव। पिता की सीख थी- ‘उड़ नहीं सकते तो दौड़ो, दौड़ नहीं सकते तो चलो, चल नहीं सकते तो रेंगो, लेकिन रुको नहीं।’ मुलायम ने इस तरह राजनीति की। कांग्रेस के विरोध से उठे, लेकिन वक्त आने पर उससे कई बार हाथ मिलाया। राम मंदिर आंदोलन के खिलाफ लड़े, फिर उसके नायक कल्याण सिंह के साथ भी खड़े हुए। चौधरी चरण सिंह की विरासत से निकले, लेकिन उनके बेटे अजीत सिंह का विरोध कर मुख्यमंत्री बने। दैनिक भास्कर की सीरीज राजनीति की रंगभूमि में कहानी उस नेता की, जिसे ‘नन्हा नेपोलियन’ कहा गया। जो राजनीति में प्रयोगवाद का झंडाबरदार रहा और सियासी दांवपेंचों की वजह से हर दौर में प्रासंगिक बना रहा… साल 1980, इटावा का सैफई गांव जसवंतनगर की सियासी चौपाल पर कांग्रेस का झंडा लहरा चुका था। मुलायम सिंह चुनाव हार चुके थे। कांग्रेस के बलराम सिंह यादव ने उन्हें पटखनी दी थी। मुलायम तीन बार इस सीट से विधानसभा जा चुके थे। यही वजह थी कि वे इस हार से काफी निराश थे और चुनाव कार्यालय में अपने कुछ साथियों के साथ बैठे थे। वो अचानक उठे और बोले- “कल मिलते हैं।” एक साथी ने कहा- “जो हुआ सो हुआ। बैठिए कुछ देर, फिर सभी निकलेंगे।” मुलायम कुछ नहीं बोले बस उठे और निकल गए। घर पहुंचे और सीधे कमरे में जाकर खटिया पर लेट गए। इकलौती बहन कमला ने उन्हें आते देखा, लेकिन कुछ बोली नहीं। घर में सभी उदास थे, खाने में खिचड़ी बनी थी। कुछ देर बाद कमला खाना लेकर मुलायम के कमरे में गई। मुलायम की आंखों में आंसू थे। कमरे के दरवाजे पर खड़ी कमला बोल पड़ी- “जिंदगी खत्म हो गई क्या?” मुलायम रुंधे गले से बोले- “चौधरी साब का कितना भरोसा था मुझ पर… इस हार से कहीं टूट न जाए।” कमला ने कहा- “अरे, कुछ अच्छा लिखा होगा। तुम देश जीतो, यहां खुद जीत जाओगे।” कमला मुस्कुराई और रेडियो चालू कर दिया। समाचार आ रहे थे। कुछ देर बाद आवाज आई- “चौधरी चरण सिंह ने मुलायम सिंह को लोकदल का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है।” कमला खुशी से उछल पड़ी, बोली- “देखो कहा था, कुछ अच्छा होगा।” यूपी चुनाव जीतने पर कांग्रेस ने वीपी सिंह मुख्यमंत्री बना दिया। उस वक्त प्रदेश में डाकुओं का आतंक था। लोग बिना चप्पल दिख जाते थे, लेकिन कंधे पर दुनाली टंगी रहती थी। वीपी सिंह ने डाकुओं पर नकेल कसनी शुरू की। आए दिन एनकाउंटर होने लगे। मुलायम को ये बात पची नहीं, उन्होंने विरोध शुरू कर दिया। वो चौधरी चरण सिंह के पास गए और बोले- “चौधरी साब, वीपी सिंह का रवैया ठीक नहीं है।” चरण सिंह समझ रहे थे मुलायम क्या कहना चाह रहे हैं। फिर भी कुछ सकुचाते हुए बोले- “मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूं, लेकिन विरोध करने से हमारा नुकसान तो नहीं होगा?” मुलायम ने कहा- “अपराधियों के नाम पर दलितों-पिछड़ों को परेशान किया जा रहा है। हम आवाज उठाएंगे तो फायदा ही होगा।” चौधरी साहब चुप्पी साध गए। मुलायम समझ गए कि चरण सिंह हिचक रहे हैं। उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीज और कर्पूरी ठाकुर को ये बात बताई। दोनों ने मिलकर चौधरी चरण सिंह को समझाया। फिर क्या था, मुलायम ने वीपी सिंह की नीतियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। वीपी फिर भी नहीं रुके, लेकिन पूरे प्रदेश में उनके खिलाफ माहौल बनने लगा। पिछड़ी जातियों के बीच कांग्रेस विरोध की लहर पैदा होने लगी। नतीजा, वीपी सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। इंदिरा गांधी ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। मुलायम की छवि मजबूत हो गई। इसके बाद देश की राजनीति में कई बड़ी घटनाएं घटीं। इंदिरा गांधी की हत्या हुई, सिख दंगों में पूरा देश झुलसा। राजीव गांधी पीएम बने। वीपी सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया, लेकिन बोफोर्स मामले से शुरू हुई अदावत कांग्रेस में टूट तक पहुंच गई। उधर यूपी में मुलायम सिंह ने राजीव और कांग्रेस के खिलाफ बिगुल फूंक रखा था। फिर वो दिन आया जब एक-दूसरे के धुर विरोधी वीपी सिंह और मुलायम सिंह साथ आ गए। 11 अक्टूबर, 1988 लोकदल, जनता पार्टी और कुछ अन्य समाजवादी धड़ों ने मिलकर नई पार्टी ‘जनता दल’ बनाया। वीपी सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। तमाम विरोध के बावजूद मुलायम सिंह यूपी के अध्यक्ष बन गए। देश में आम चुनाव और यूपी विधानसभा चुनाव एक साथ होने थे। पीएम बनने के लिए यूपी को साधना जरूरी था। यहां कांग्रेस का मुकाबला जनता दल से नहीं बल्कि ‘मुलायम सिंह’ से था। चौधरी साहब की मौत के बाद मुलायम यूपी में पिछड़ों के सबसे बड़े नेता बन चुके थे। एक दिन राजीव गांधी ने तब के यूपी कांग्रेस अध्यक्ष बलराम सिंह यादव को दिल्ली बुलाया। राजीव बोले- “मुलायम सिंह को किसी भी तरह से रोकना होगा।” बलराम में कहा- “जब मैंने उसे हराया था, तब उम्मीद नहीं थी वो इतना बड़ा हो जाएगा।” राजीव गांधी- “क्या स्ट्रेटजी होनी चाहिए? उसे नहीं रोका तो हम हार जाएंगे।” बलराम यादव- “पिछड़ों में उसकी पकड़ बढ़ गई है। अजीत सिंह अभी कच्चे हैं और मुलायम, चरण सिंह की जगह ले रहा है। हमें पिछड़ा कार्ड खेलना होगा।” बैठक में हुए फैसले के तहत मुलायम सिंह को काटने के लिए ‘यादव ट्रिओ’ यानी बलराम यादव, चंद्रजीत यादव और रामनरेश यादव को मैदान में उतारा गया। चंद्रजीत, इंदिरा और संजय गांधी के करीबी रहे थे। रामनरेश यादव जनता पार्टी के समय यूपी के सीएम रहे थे। वो जनता दल में शामिल हुए थे, लेकिन मुलायम सिंह के प्रदेश अध्यक्ष बनने से नाराज होकर कांग्रेस में आ गए। फिर भी कांग्रेस की स्ट्रेटजी काम नहीं आई। पूरे प्रदेश में नारा गूंजने लगा- “ठाकुर की बुद्धि, अहीर का बल, इसी का नाम जनता दल।” मुलायम का कद और बढ़ गया। यूपी विधानसभा और लोकसभा दोनों में कांग्रेस को करारी हार मिली। वीपी सिंह पीएम बने, लेकिन मुलायम से खार खाए हुए थे। वो नहीं चाहते थे मुलायम सीएम बनें। वो पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को सीएम बनाना चाहते थे। दिसंबर, 1989। लखनऊ का तिलक हॉल। जनता दल के विधायकों की बैठक चल रही थी। सीएम के नाम पर मुहर लगनी थी। हॉल के बाहर और भीतर अजीत और मुलायम के समर्थकों की नारेबाजी चल रही थी। तभी मुलायम उठे और बोले- “शांत हो जाओ…।” नारेबाजी और बढ़ गई- “नाम मुलायम है, काम फौलादी है।” मुलायम ने फिर कहा- “अरे मेरी बात मानो। शांत हो जाओ। नारे लगाने के मौके मिलेंगे।” नारेबाजी रुक गई। दिल्ली से आए दो ऑब्जर्वर मधु दंडवते और सुरेंद्र मोहन भी वहां मौजूद थे। मधु के जेब में एक पर्ची थी, जिस पर वीपी सिंह ने सीएम के लिए अजीत सिंह पर मुहर लगाई थी। मधु उठे, पॉकेट में हाथ डाला। मुलायम को शक हुआ। वो भी उठे और जोर से बोले- “रुकिए,रुकिए…।” हाल में कानाफूसी शुरू हो गई। मुलायम ने कहा- “पर्ची मत निकालिए। आप यहां निष्पक्ष चुनाव कराने आए हैं। बस वही कीजिए।” चुनाव हुआ तो ज्यादातर विधायकों ने मुलायम सिंह का समर्थन किया। इस तरह मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के सीएम बने। 1 जनवरी, 1990 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आदेश दिया कि अयोध्या में विवादित जमीन मैपिंग फोटोग्राफी और ढांचागत सर्वे कराया जाए। केंद्र और प्रदेश दोनों जगह जनता दल की सरकार थी। भाजपा दोनों जगह सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। बावजूद इसके रामजन्मभूमि आंदोलन के जरिए सरकार की नाक में दम कर रखा था। देश की राजनीति बदल रही थी। विश्व हिंदू परिषद (VHP), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बीजेपी राममंदिर का मुद्दा हर नुक्कड़ और चौराहे पर उठाने लगे। मुलायम सिंह परेशान थे। वो दिल्ली जाकर वीपी सिंह से मिले- “प्रधानमंत्री जी, भाजपा वाले सांप्रदायिक राजनीति को हवा दे रहे हैं। मस्जिद की घेराबंदी कभी भी शुरू हो सकती है। आप उनसे बात क्यों नहीं करते?” वीपी सिंह ने कोई खास रिएक्शन नहीं दिया। बस इतना कहा- “ठीक है, मैं बात करता हूं।” 7 अगस्त, 1990 प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दीं। पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया। मुलायम प्रदेश में अपने लोगों के साथ बैठक की। किसी ने कहा- “वीपी सिंह पिछड़ों के भगवान बन जाएंगे। हम पीछे रह जाएंगे।” मुलायम ने कहा- “कुछ नहीं होगा। मेरे पास एक दांव है।” सब शांत हो गए। सबको पता था नेता जी कुछ ऐसा पासा फेकेंगे कि सबकी चालें ध्वस्त हो जाएंगी। मुलायम ने कहा- “हम पंचायत लेवल पर रिजर्वेशन लागू करेंगे।” मुलायम ऐसा करने वाले देश के पहले मुख्यमंत्री बने। इससे पिछड़ी जातियों में मुलायम की छवि और पुख्ता हुई। इधर भाजपा बेचैन थी। मंडल के दांव से सबकुछ उल्टा पड़ गया था। देश का बड़ा हिस्सा विपक्ष की तरफ लामबंद होने लगा। दूसरी तरफ आरक्षण के खिलाफ देशभर में हिंसा की आग भड़क गई। 8 अगस्त 1990, पटना जनता दल की एक रैली में चल रही थी। मुलायम सिंह यादव के साथ लालू यादव और शरद यादव भी शामिल थे। पिछड़ों को अपने साथ करने के बाद अब बारी थी, अल्पसंख्यकों का भरोसा जितने की। मुलायम सिंह गरजे- “अगर एक मुसलमान की जान को खतरा आएगा तो सौ यादव जान देने को तैयार हो जाएंगे।” भाजपा बेचैन हो उठी। पूरा देश ‘मंडल और कमंडल ‘ की राजनीति में फंस चुका था। 13 अगस्त को भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने मुस्लिम नेताओं के साथ बैठक की। प्रस्ताव दिया- “रामजन्मभूमि से मुस्लिम दावा से हटा लें तो हम मथुरा, वाराणसी की अपनी मांग पर जोर नहीं देंगे।” मुस्लिम नेताओं ने ये पेशकश ठुकरा दी। आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ मंदिर, गुजरात से रथयात्रा शुरू की। रथयात्रा को जबरदस्त समर्थन मिल रहा था। मुलायम ने अपने सहयोगियों के साथ फिर से मीटिंग की- “बीजेपी के पक्ष में माहौल बन रहा है। मुसलमान डरे हुए हैं। मुस्लिम नेता मुझ पर कुछ करने का दबाव बना रहे हैं।” किसी ने कहा- “रथ अयोध्या तक पहुंचा तो अनहोनी हो जाएगी।”
मुलायम- “अगर रथ मैं यूपी में न घुसने दूं तो?” बैठक में सन्नाटा छा गया। एक ने कहा- “ये कैसे होगा…?”
मुलायम बोले- “मैं आडवाणी को गिरफ्तार करूंगा।” और इस फैसले के साथ बैठक खत्म हो गई। वीपी जानते थे अगर मुलायम ने रथयात्रा रोकी तो अल्पसंख्यक भी उनके पीछे खड़े हो जाएंगे। पिछड़ी जातियां तो पहले ही मुलायम के पक्ष में हैं। इसकी काट के लिए वीपी ने बिहार के सीएम लालू यादव को फोन लगाया, बोले- “रथयात्रा बिहार में रोक दीजिए। आडवाणी को गिरफ्तार कीजिए।” लालू यादव ने 23 अक्टूबर को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार करवा दिया। कई जगह छिटपुट हिंसा हुई। अयोध्या के आसपास के इलाकों में भी कर्फ्यू लग गया। मुलायम ने भी VHP के कई नेताओं को गिरफ्तार करवा दिया। मुलायम सिंह को देशभर में खलनायक की तरह पेश किया जाने लगा। भाजपा ने वीपी सिंह पर दबाव बनाया कि मुलायम VHP नेताओं को छोड़ें। वीपी सिंह ने अपने करीबी फर्रुखाबाद के सांसद संतोष भारतीय लखनऊ भेजकर मुलायम को समझाने भेजा। मुलायम सिंह भड़क उठे। उन्होंने गुस्से भरे लहजे में कहा- “मैं नहीं छोड़ सकता।” संतोष को ऐसी ही जवाब की उम्मीद थी। उन्होंने मुलायम को डराया- “नहीं छोड़ेंगे तो भाजपा समर्थन वापस ले लेगी। सरकार गिर जाएगी।” मुलायम ने कहा- “मुझे इसकी चिंता नहीं है। 28 अक्टूबर, 1990 देश-विदेश की मीडिया लखनऊ में थी। अमेरिका की टाइम्स मैगजीन के पत्रकार रॉबर्ट निकल्सबर्ग ने मुलायम से पूछा- “मस्जिद बचने के लिए आप क्या करेंगे?” मुलायम ने कहा- “सरकार बचे या न बचे, मस्जिद मेरी लाश पर गिरेगी।” पत्रकार ने दूसरा सवाल दागा- “क्या राम आपके लिए आस्था नहीं है?”
मुलायम ने जवाब दिया- “मैं उस राम को मानता हूं जो सबको एक मानते हैं। मैं उस राम को मानता हूं जिसे गांधी मानते हैं।” तभी दूसरे पत्रकार ने कहा- “आडवाणी अयोध्या आ रहे हैं।” मुलायम मुस्कुराकर कहा- “वो आज तक अयोध्या नहीं आए। अचानक उन्हें अयोध्या प्रेम क्यों जाग गया? आएंगे तो देख लिया जाएगा।” 30 अक्टूबर 1990 लखनऊ-फैजाबाद रोड पर 126 किलोमीटर के रास्ते में करीब 10 बैरिकेडिंग लगी थीं। सुबह-सुबह हजारों कारसेवकों की भीड़ बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ रही थी। भारी भीड़ देख सुरक्षा बल के पसीने छूटने लगे। मुलायम सिंह के ऑफिस में फोन घनघनाने लगे- “भीड़ बढ़ रही है। मामला कंट्रोल से बाहर जा रहा है।” देखते ही देखते कुछ कारसेवक मस्जिद की गुंबद पर चढ़कर भगवा झंडा लहराने लगे। दोपहर का वक्त था। एकाएक पुलिस ने फायरिंग कर दी। पलभर में हजारों की भीड़ से भरा मैदान खाली हो गया, लेकिन सामने का दृश्य भयावह था। हर तरफ खून के छींटे…। ऐसा ही मंजर 2 नवंबर को फिर सामने आया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दो दिनों में पुलिस फायरिंग से 16 कारसेवक मारे गए। नतीजा, भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिर गई। समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने जनता दल से बगावत करके ‘समाजवादी जनता पार्टी’ बना ली। उनके साथ 64 सांसद थे। मुलायम भी चंद्रशेखर की पार्टी मे शामिल हो गए। कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर पीएम बने। इधर यूपी में कांग्रेस के ही समर्थन से मुलायम सीएम बने रहे। जिस कांग्रेस का विरोध करके मुलायम सीएम बने, उसी के समर्थन से कुर्सी बचा ले गए। मगर ये सरकार भी ज्यादा दिन न टिक सकी। कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया, तो यूपी में भी सरकार गिर गई। देश में फिर से चुनाव की तैयारी शुरू हुई। भाजपा ने राममंदिर का मुद्दा उठाया और मुलायम को खलनायक की तरह पेश किया। मुलायम की छवि पर हिंदू विरोधी होने की दाग लग चुका था। गृह जनपद इटावा में भी लोगों ने मुलायम को नापसंद करना शुरू कर दिया। मुलायम जानते थे, भाजपा के पक्ष में माहौल बन रहा है। उन्हें आभास हुआ कि पिछड़ों की राजनीति में भी डेंट लगा है। वो अब नए सिरे से अपने वोटबैंक को साधने लगे। 5 मार्च, 1991 मुलायम सिंह जमीयत-ए-उलेमा के एक प्रोग्राम में शामिल हुए। मुसलमान नेताओं ने उनसे कहा- “भाजपा बढ़ रही है, क्या हमें डरना चाहिए?” मुलायम बोले- “मुलायम के रहते किसी से डरने की जरूरत नहीं।”
किसी ने कहा- “लेकिन ऐसा लग रहा है इस बार यूपी पर भाजपा कब्जा कर लेगी।” मुलायम- “भाजपा सांप्रदायिक पार्टी है। मुझे जिताएं, मैं उस पर प्रतिबंध लगा दूंगा, लेकिन इसके लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए।” चुनाव नतीजे आए तो भाजपा को 221 सीटें मिलीं। पहली बार यूपी में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। कल्याण सिंह सीएम बने। मुलायम सिंह की राजनीति के लिए ये बुरा दौर था। फ्रैंक हुजूर अपनी किताब ‘मुलायम सिंह यादव’ में लिखते हैं- “भाजपा, VHP और RSS के लोगों ने आवारा कुत्तों और गधों पर मुलायम सिंह का नाम लिख दिया।” उसी दौरान इटावा के जीआई मैदान में समाजवादी नेताओं का रैली हुई। रैली के बाद मुलायम सिंह एक साथी सीपी राय के साथ कचहरी जा रहे थे। शहर के दुकानदार रास्ते के किनारे खड़े हो गए और जैसे ही मुलायम की गाड़ी सामने से निकलती सब उस पर थूकने लगे। ये सब मुलायम के गृह जनपद में हो रहा था। मुलायम सिंह उदास हो गए। उन्होंने कहा- “देख लो, सीपी लोगों को मुझसे कितनी घृणा हो गई है।” सीपी राय ने कहा- “नहीं भाई साब, आप उदास मत होइए। जिस दिन लोगों को संविधान के लिए आपकी वफादारी का एहसास हो जाएगा, यही लोग माला लेकर खड़े होंगे।” मुलायम समझ गए थे अब उन्हें अपने बल पर कुछ करना होगा। वो चंद्रशेखर की सरपरस्ती में उनकी पार्टी में थे। फिर भी चंद्रशेखर पर उनका विश्वास कमजोर हो रहा था। राजीव गांधी की मौत के बाद चंद्रशेखर तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के करीब हो गए थे। मुलायम को लगा उन्हें अपनी पार्टी बनानी होगी। अक्टूबर, 1992 को मुलायम ने लखनऊ में समाजवादी पार्टी बनाने की घोषणा कर दी। इधर यूपी में बहुत कुछ घट रहा था। भाजपा के शासन में ही 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। कई जगह दंगे हुए। केंद्र ने यूपी की कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया। मध्यावधि चुनाव की घोषणा हुई। बदलते माहौल के बीच, बसपा सुप्रीमो कांशीराम का बयान आया- “मुलायम की नीतियां दलित समर्थक हैं। वह धर्मनिरपेक्ष हैं।” 1993 विधानसभा चुनाव के लिए बसपा-सपा में गठबंधन हुआ। दोनों की सरकार भी बन गई। 1995 में सपा-बसपा गठबंधन टूट गया और सरकार गिर गई। मुलायम जोड़तोड़ की राजनीति में माहिर थे। वो केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए। 1996 में मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे। गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपाई विपक्षी दलों ‘यूनाइटेड फ्रंट’ के नाम से गठबंधन बनाया था। मुलायम की सपा भी उसमें शामिल थी। उनका प्रधानमंत्री बनना तय था, लेकिन लालू यादव और शरद यादव की वजह से ऐसा नहीं हो सका। साल 1990। मुलायम सिंह का यूपी में राजनीतिक एक्सपेरिमेंट मार खाता जा रहा था। चुनाव में मात खाने के बाद मुलायम सिंह दिल्ली गए। उन्हें यूपी भवन में रुकना था, लेकिन व्यवस्था नहीं हो पाई। उनके साथ आज के कांग्रेस नेता और तब के वरिष्ठ पत्रकार राजीव शुक्ला भी थे। मुलायम ने शुक्ला से कहा- “कहीं रुकने की व्यवस्था नहीं हो रही है, क्या करूं?” राजीव तुरंत अमर सिंह के पास गए। अमर सिंह ने कहा- “मुलायम जी को सम्राट या अशोका होटल कहीं भी ले जाएं। मैं वहां बात करता हूं।” अब मुलायम जब भी दिल्ली आते, अमर सिंह उनके रहने की व्यवस्था करा देते। एक बार किसी फ्लाइट में मुलायम सिंह और अमर सिंह की मुलाकात हो गई। अमर सिंह ने कहा- “जनता पार्टी के चुनावी रणनीति पर फिर से वापस जाएं। पिछड़ों और दलितों के साथ जाट और ठाकुर वोट पर भी फोकस करें।” अमर सिंह ने एक और बात कही- “कांग्रेस को लेकर कम आक्रामक रहें। उनकी जरूरत कभी भी पड़ सकती है।” फ्लाइट में हुई इस मुलाकात के बाद दोनों इतना करीब आए कि 1996 में सपा के टिकट पर अमर सिंह राज्यसभा पहुंच गए। देखते ही देखते अमर सिंह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बन गए। 1997 में यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। भाजपा ने राममंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरे कल्याण सिंह को सीएम पद से हटा दिया। कल्याण सिंह ने भाजपा से बगावत करके ‘राष्ट्रीय क्रांति पार्टी’ नई पार्टी बना ली। यूपी में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गईं। मुलायम सभी जातियों को सपा के पाले में करने में जुट गए। 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा 143 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। मुलायम, अमर सिंह के साथ सपा दफ्तर में बैठे थे। मुलायम ने कहा- “सबसे बड़ी पार्टी होने का क्या फायदा, जब सरकार ने बने?” अमर सिंह- “सरकार बनेगी।” मुलायम ने हैरत से अमर सिंह की तरफ देखा। अमर सिंह ने कहा- “मैंने कांग्रेस में बात की है। हमें बाहर से समर्थन मिलेगा।” मुलायम- “फिर भी हम बहुमत से बहुत दूर रहेंगे।” अमर सिंह- “शिवपाल बसपा के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों के संपर्क में हैं। आप सरकार बनाने की दावा कीजिए। वो हमें वोट देंगे।” मुलायम ने सरकार बनाने की दावा ठोक दी। ये मुलायम की प्रयोगवादी राजनीति का उरूज ही था कि जो कल्याण सिंह, जो कभी मुलायम के मुख्य विरोधी थी। उन्होंने भी सपा का समर्थन किया। मुलायम ने जिन सोनिया गांधी को ‘विदेशी मूल’ का बताकर पीएम बनने से रोक था, वो भी सपा के साथ थीं। अजीत सिंह से बगावत करके मुलायम ने बड़ा कदम बढ़ाया था, वो सरकार में शामिल हुए। बसपा के करीब 40 विधायक भी मुलायम के समर्थन में आ गए। मुलायम ने तीसरी बार सीएम पद की शपथ ली। साल 2007-08 मुलायम पर कई तरह के आरोप लगे। पिछड़ा वोट बसपा की तरफ लामबंद होने लगा। सपा पर गुंडों को पार्टी होने के आरोप लगने लगे। मुलायम ने अमर सिंह से सलाह ली। अमर सिंह ने बिना लाग-लपेट के कहा- “हालात खराब हैं नेताजी। बसपा पिछड़ा वोट खींच रही है। मुसलमान असमंजस में हैं। किसान अजीत सिंह से साथ हैं। यही वक्त है एक और बड़ा दांव खेलने का।” कुछ दिन बाद मुलायम सिंह दिल्ली पहुंचे और कल्याण सिंह से मिले। मुलायम ने सीधे मुद्दे पर बात की- “कल्याण जी, बीजेपी ने आपको किनारे कर दिया, लेकिन आपकी जमीन आज भी यूपी में है। हम साथ मिलकर बीजेपी को रोक सकते हैं।” कल्याण सिंह मुस्कुराए, बोले- “हम दोनों की राजनीति अलग है, ये कैसे संभव है, नेता जी?” थोड़ी देर कुछ बात हुई और दोनों ने हाथ मिला लिया। बातचीत के बाद, मुलायम लखनऊ वापस आए। अब मुलायम और कल्याण रैलियों में एक साथ दिखने लगे, लेकिन चुनाव में दांव उल्टा पड़ गया। मुसलमानों में नाराजगी गहरी हो गई। कांग्रेस भी हमला करने लगी। मायावती ने इसे ‘धर्मनिरपेक्षता से धोखा’ कहा। नतीजा, सपा 2007 का चुनाव हार गई। मुलायम कैमरे के सामने आए। उनकी आवाज में थकान थी। उन्होंने कहा- “मैं मानता हूं कि बाबरी मस्जिद गिराने के आरोपी नेता से गठबंधन करना मेरी बड़ी गलती थी। मुझमें इतना साहस है कि मैं अपनी गलती स्वीकार करूं और पार्टी से माफी मांगूं।” ये कहानी थी मुलायम की, जिन्होंने अपनी राजनीतिक जीवन में कई प्रयोग किए। वो जोड़तोड़ की राजनीति के मास्टर थे। हवा का रुख भांपने में माहिर। उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन मुलायम भारतीय राजनीति में हमेशा प्रासंगिक बने रहे। वो तीन बार यूपी के तीन बार सीएम बने। देश के रक्षा मंत्री रहे, सात बार सांसद और दस बार विधायक रहे। इसके अलावा दो बार पीएम बनते-बनते रह गए। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल *** रेफरेंस किताब- At the power of heart The chief ministers of Uttar Pradesh – Shyamlal Yadav | Mulayam Singh – Frank Huzur | Mulayam Singh Yadav and Socialism – Deshbandhu Vashisht सीनियर जर्नलिस्ट- ब्रजेश शुक्ला, राजेंद्र कुमार | समाजवादी नेता- सीपी राय (मुलायम के करीबी) कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। ———————————————————– सीरीज की ये स्टोरीज भी पढ़ें… ‘कच्ची छोरी’ ने खींची मुलायम की कुर्सी, 12 घंटे में ऐसे बदली UP की सियासत राजनीति में कई दिन ऐसे होते हैं, जो दशकों का भविष्य तय कर देते हैं। ये कहानी उस दौर की है, जब सत्ता साझेदारी नहीं, सौदेबाजी पर टिकी थी। एक तरफ मुलायम सिंह सत्ता को सीढ़ी मान रहे थे, दूसरी तरफ कांशीराम आंदोलन की चाबी। बीच में थीं मायावती… जिन्हें पहले दूर रखा गया, फिर कंट्रोल किया गया और आखिर में मिटाने की कोशिश की गई। पूरी स्टोरी पढ़ें… इंदिरा पर लगा था ‘वोट चोरी’ का आरोप; राज नारायण बोले- बैलेट पर जादुई स्याही थी, कांग्रेस निशान अपने आप उभर आता है दिसंबर, 1970 की वो रात दिल्ली की हड्डियों में कंपकंपी पैदा कर रही थी। राष्ट्रपति भवन के भीतर जो लावा उबल रहा था, 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