बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद राहुल गांधी का पहला बड़ा कार्यक्रम रायबरेली में हुआ। यहां उन्होंने न सिर्फ कार्यकर्ताओं से बात की, बल्कि क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्घाटन किया। नगर पालिका अध्यक्ष के घर पहुंचे और उमरन गांव में ‘मनरेगा बचाओ चौपाल’ में गांववालों से रूबरू हुए। लेकिन, इस बार राहुल का अंदाज बदला-बदला सा था। न कोई आक्रामक तेवर, न ही कोई ‘हटके’ स्टंट। संयमित भाषा, सधे शब्द और ग्रामीणों से सरल संवाद- यह राहुल का नया ‘मैच्योर’ चेहरा था। राजनीतिक जानकार इसकी दो वजह बताते हैं। पहला- बिहार चुनाव ने आक्रामकता को स्वीकार नहीं किया। वहां, कांग्रेस महज 19 सीटों पर सिमट गई। दूसरा- राहुल अब अपनी बहन प्रियंका गांधी की तरह ‘सधे अंदाज’ वाले नेता की छवि गढ़ रहे हैं, जो सदन में भी प्रभावी साबित हो। लेकिन, सवाल यह है कि क्या राहुल का यह नया स्टाइल कांग्रेस को बढ़ा पाएगी? या मोदी सरकार के मनरेगा ‘चेंजेस’ पर यह सिर्फ एक चुनावी नारा साबित होगा? पढ़िए भास्कर एनालिसिस… राहुल ने ‘ग्राउंड कनेक्ट’ पर अधिक जोर दिया
राहुल गांधी का रायबरेली दौरा सुबह कार्यकर्ताओं से संवाद के साथ शुरू हुआ। इस दौरान उनसे सपा के स्थानीय नेता भी मिले। शहर में कई जगह लगे होर्डिंग ने भी लोगों का ध्यान खींचा, जिनमें राहुल-अखिलेश को 2027 और 2029 लोकसभा चुनाव का कैप्टन दिखाया गया था। राहुल ने रायबरेली स्थित सांसद निवास में कांग्रेस के एक-एक कार्यकर्ता से मुलाकात की। इस दौरान जो लोग जिले की अलग-अलग समस्याओं को लेकर पहुंचे थे, उनसे भी बात की। राहुल गांधी फतेहपुर के राहुल वाल्मीकि मामले की भी जानकारी लेना नहीं भूले। जिला कांग्रेस अधिवक्ता कमेटी के अमरेश बाजपेई ने बताया- ड्रोन चोर समझकर बीते दिनों ऊंचाहार में लोगों ने राहुल वाल्मीकि की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस मामले में राहुल गांधी खुद पीड़ित परिवार से मिलने फतेहपुर गए थे। अपने संसदीय क्षेत्र पहुंचे तो इस केस का अपडेट लेना नहीं भूले। यह बताता है कि वह एक आम व्यक्ति की पीड़ा को कितना महत्व देते हैं। अमरेश बाजपेई के मुताबिक, इस केस में 19 गिरफ्तारियां हुई हैं। 15 की जमानत खारिज हो चुकी है। 6 की जमानत अर्जी हाईकोर्ट में लंबित है। भारतीय किसान यूनियन का एक प्रतिनिधिमंडल भी राहुल से मिलने पहुंचा था। इसमें शामिल अनिल वर्मा ने बताते हैं- क्षेत्र में नहरों से सिंचाई होती है, लेकिन सफाई न होने से टेल तक पानी नहीं पहुंच रहा। व,हीं किसानों को खाद नहीं मिल पा रही। खाद की लाइन लगाने में भी 100-100 रुपए की रिश्वत ली जा रही। जिले में जितनी भी सीएचसी हैं, वहां न तो प्रॉपर तरीके से डॉक्टर बैठ रहे और न ही लोगों को इलाज मिल पा रहा। इसी तरह ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के लोगों ने शहर में नए ट्रांसपोर्ट नगर की स्थापना की मांग की। राहुल से मिलने पहुंची दिव्यांशी ने बताया कि हमने उन्हें नकल के चलते निरस्त होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं की समस्या के बारे में बताया। जिसे उन्होंने बहुत ध्यान से सुना और आश्वासन दिया कि कांग्रेस पार्टी से जो भी बन पड़ेगा, करेगी। दोपहर में सांसद आवास से निकल कर राहुल क्रिकेट टूर्नामेंट का शुभारंभ करने पहुंचे। फिर नगर पालिका अध्यक्ष शत्रोहन सोनकर के घर पहुंचे। 8 दिन पहले उनकी बेटी की शादी थी, जिसमें राहुल नहीं आ पाए थे। राहुल ने पूरे परिवार से मुलाकात की। घर के सबसे छोटे सदस्य से एक दोस्त की तरह उसकी रुचि वाले क्रिकेट पर बातें कीं। यह दिखाता है कि राहुल हर उम्र के लोगों से आसानी से घुल मिल सकते हैं। मनरेगा बचाओ संग्राम में राहुल की टोन बेहद संयत रही
रायबरेली से 50 किमी दूर ऊंचाहार के उमरन कस्बे में राहुल ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के तहत लगाई गई चौपाल में पहुंचे। यहां करीब 1000 महिलाएं और पुरुष जुटे। राहुल ने यहां मोदी सरकार पर मनरेगा में बदलावों को लेकर हमला बोला, लेकिन टोन बेहद संयत थी। राहुल के पहुंचने से पहले ग्रामीणों को एक ब्रोशर (विवरणिका) भी बांटा गया था। इसमें पुराने और नए कानून के अंतर को सरल भाषा में समझाया गया था। साथ ही मिस्ड कॉल और QR कोड स्कैन के जरिए ‘मनरेगा बचाओ आंदोलन’ से जुड़ने की अपील की गई। राहुल के साथ अमेठी सांसद किशोरी लाल शर्मा भी चौपाल पहुंचे थे। उन्होंने कहा- जब राज्य सरकारें 10% राशि नहीं दे पा रहीं, तो 40% कैसे देंगी? यह मनरेगा को खत्म करने की साजिश है। राहुल ने चौपाल में अभिवादन से शुरुआत की
चौपाल में राहुल ने पूछा- आप लोग कैसे हैं? फिर मनरेगा को लेकर बात की। उन्होंने कहा- कांग्रेस की मनमोहन सरकार मनरेगा लाई थी, ताकि योजना पंचायत से चले, न कि केंद्र या राज्य से। इससे लाखों गरीबों को रोजगार मिला, गांवों में सड़कें, पुल, तालाब बने। लेकिन, मोदी जी ने लोकसभा में इसका मजाक उड़ाया और अब धीरे-धीरे इसका गला घोंट रहे हैं। राहुल ने कोविड काल का जिक्र किया, जब मनरेगा ने मजदूरों की रक्षा की। लेकिन, अब सरकार इसे खत्म कर अडाणी-अंबानी जैसे उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाना चाहती है। राहुल की तरकश से मोदी सरकार पर चले ‘तीन तीर’
राहुल ने मनरेगा में बदलावों को 3 बिंदुओं में तोड़कर समझाया। पहला- काम की गारंटी छीनी जा रही है। पुराने कानून में हर परिवार को 100 दिनों की कानूनी गारंटी थी, हर गांव में काम मिलता था। अब सिर्फ मोदी सरकार के चुने गांवों में काम, कोई गारंटी नहीं। दूसरा- न्यूनतम मजदूरी का अधिकार खत्म। पहले पूरे साल काम मांग सकते थे, कानूनी मजदूरी मिलती थी। अब फसल कटाई के मौसम में काम नहीं, मजदूरी सरकार की मर्जी से। तीसरा- ग्राम पंचायत को साइडलाइन किया गया। पहले पंचायत से विकास कार्य होते थे। मेट और रोजगार सहायकों का सहयोग मिलता था। अब ठेकेदारों के जरिए मनमानी, कोई सहयोग नहीं। साथ ही, राज्यों पर 40% वित्तीय बोझ, जो खर्च बचाने के लिए काम ही बंद करा सकता है। भास्कर पोल में हिस्सा लेकर अपनी राय दीजिए… क्या बिहार की हार से ‘संयम मोड’ में राहुल? राहुल गांधी का यह दौरा सिर्फ मनरेगा पर नहीं, कांग्रेस की ग्रामीण राजनीति को धार देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा। बिहार चुनाव में NDA की जीत ने राहुल को आक्रामकता का खतरा समझा दिया है। वहां तेजस्वी यादव के साथ गठबंधन फेल हुआ। कांग्रेस की ‘एंग्री यंग मैन’ इमेज वोटर्स से नहीं जुड़ी। अब राहुल ‘प्रियंका मॉडल’ की राजनीति पर चलते हुए दिखना चाहते हैं। बेहद सधे हमले, ग्रामीण कनेक्ट और संविधान की बात। उन्होंने कहा- BJP संविधान खत्म करना चाहती है। पंचायतों को कमजोर कर लोकतंत्र की तीसरी कड़ी तोड़ना चाहती है। यह RSS की सोच है। वह गांधी, अंबेडकर को मिटाना चाहती है। गरीबों से हक छीन अडाणी-अंबानी को देना चाहती है। वरिष्ठ पत्रकार विजय प्रताप सिंह कहते हैं- बिहार में एसआईआर का मुद्दा था। तब विषय ऐसा था कि राहुल को अक्रामकता दिखानी पड़ी थी। लेकिन, यहां मामला मनरेगा जैसे विषय से जुड़ा है। कांग्रेस के सामने संकट ये है कि उसके पास ग्रास रूट कार्यकर्ता नहीं हैं। ऐसे में ये भूमिका भी राहुल को निभानी पड़ रही है। अगर संगठन मजबूत होता तो ये काम वो करता और राहुल गांधी इसे जन आंदोलन बनाने की कोशिश करते। लेकिन, यहां संगठन न होने का नुकसान है। कांग्रेस के एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष को वाराणसी में पुलिस पीट देती है। लेकिन, यूपी कांग्रेस इसे मुद्दा तक नहीं बना पाती। यही कांग्रेस की असल कमजोरी है। राहुल की बात का ग्रामीणों पर असर दिखा
राहुल की बातों का ग्रामीणों पर भी असर दिखा। चौपाल में पहुंची मिथिलेश कहती हैं- पुराना कानून ही लागू हो। नए वाले कानून से हमारा अधिकार छीनने की कोशिश होगी। पुराना कानून ही सबसे अच्छा है। रोहनिया के दातादीन बोले कि ओ जउन कहिन सब ठीके कहिन। हमका 5 रुपए का पान खवावा है और तीन बीघा जमीन दिन्हीं है। गौसपुर की फूलमती बोलीं कि हम गरीब लोग मजदूरी करके चार पैसा पा रहे थे। अब नया कानून बनाकर हमारी मजदूरी छीनी जा रही। कुल मिलाकर राहुल अपने भाषण के जरिए गांववालों को ये समझाने में सफल दिखे कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मनरेगा की भूमिका अहम है। खासकर महंगाई और बेरोजगारी के दौर में। मोदी सरकार भले ही दावा करती रहे कि बदलाव ‘कुशलता’ बढ़ाने के लिए किया गया है। लेकिन, राहुल ने इसे ‘प्राइवेटाइजेशन’ का रास्ता बता ग्रामीणों को समझा दिया कि पुराना मनरेगा कानून ही उनके लिए हितकर था। अब भाजपा को इसकी काट खोजनी होगी। नहीं तो कांग्रेस यूपी में भाजपा के खिलाफ 2024 जैसा नया नरेटिव गढ़ने में सफल हो जाएगी। ———————- ये खबर भी पढ़ें… राहुल बोले-मोदी गरीबों को भूखा मारना चाहते, देश का धन अंबानी-अडाणी को देना चाह रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने रायबरेली दौरे पर हैं। उन्होंने कहा- नरेंद्र मोदी सारा पावर अपने हाथों में लेकर गरीबों को भूखा मारना चाहते हैं। मनरेगा से गांधी जी का नाम हटाकर उनका अपमान किया है। मगर मुख्य बात नाम बदलने की नहीं है। हमारी गरीब जनता को जो सुरक्षा दी गई थी, उसे मोदी सरकार ने खत्म कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर