यूपी के कद्दावर मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में शामिल होंगे। वह जल्द ही इसका ऑफिशियल ऐलान करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश से कई राउंड में उनकी बात हो चुकी है। सपा में उन्हें पश्चिम यूपी में पार्टी का अहम पद दिया जाएगा। महाशिवरात्रि के दिन अखिलेश यादव खुद नसीमुद्दीन, अपना दल (एस) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार पाल समेत कई नेताओं को सपा की सदस्यता दिलाएंगे। नसीमुद्दीन ने 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। इसके बाद से ही नसीमुद्दीन के अगले कदम पर सबकी निगाहें टिकी हुई थीं। दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- वे फिरकापरस्तों को हराने वाली पार्टी में शामिल होंगे या नई पार्टी बनाएंगे। बसपा से राजनीति की शुरुआत करने वाले सिद्दीकी मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। पश्चिम यूपी के मुस्लिम वोट बैंक में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। नसीमुद्दीन के साथ 73 और कांग्रेस नेताओं ने भी कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी। इसमें कई पूर्व विधायक भी शामिल थे। सपा ने क्यों खेला दांव, क्या बदलेगा पश्चिमी यूपी का समीकरण
सिद्दीकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्ष भी थे। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर के आसपास के जिलों में मुस्लिम वोट बैंक पर उनकी बड़ी पकड़ मानी जाती है। इसके देखते हुए सपा ने यह दांव खेला है। अभी कांग्रेस के इमरान मसूद पश्चिमी यूपी में अधिक सक्रिय हैं। वह अक्सर सपा पर हमलावर भी रहते हैं। सपा नसीमुद्दीन के जरिए मुस्लिमों को यह संदेश देना चाहती है कि इस कौम की असली चिंता करने वाली वह एकमात्र पार्टी है। पश्चिमी यूपी में बसपा भी मुस्लिमों के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा रही थी। सपा नसीमुद्दीन को पार्टी में शामिल कर इसकी काट करेगी। आजम खान के जेल में जाने के बाद उनके कद का कोई मुस्लिम चेहरा सपा में नहीं रह गया था। नसीमुद्दीन के जरिए सपा इसकी भरपाई करना चाहेगी।
क्यों दिया कांग्रेस से इस्तीफा, जानिए लोकसभा चुनाव में नहीं मिली थी तवज्जो
कांग्रेस में नसीमुद्दीन की भूमिका और प्रभाव को लेकर असंतोष चल रहा था। 2024 लोकसभा चुनाव में भी उन्हें तवज्जो नहीं मिली थी। 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ नसीमुद्दीन कांग्रेस में अपने भविष्य को लेकर परेशान थे। कांग्रेस में सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद का कद जिस तेजी से बढ़ा है, उनकी गिनती प्रियंका के खास सिपहसालारों में होती है। इससे भी सिद्दीकी खासा परेशान थे। बीते दिनों अमौसी एयरपोर्ट पर राहुल गांधी को रिसीव करने के दौरान प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा सहित अन्य नेताओं के आगे उन्हें एंट्री नहीं मिली थी। 24 जनवरी को नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इस्तीफा दिया। इसमें लिखा- मैं कांग्रेस में जातिवाद की लड़ाई लड़ने आया था। 8 साल से जमीन पर काम नहीं कर पाया। मुझमें जंग लग रही थी। मैं राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी का सम्मान करता हूं। आगे भी करता रहूंगा, लेकिन पार्टी में मेरे लिए कोई काम नहीं था। मैं कांग्रेस में इसलिए शामिल हुआ था कि संप्रदायवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ सकूं, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा था।
अजय राय ने मनाने की कोशिश की, लेकिन नहीं माने
सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफे के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय उन्हें मनाने की कोशिश में जुटे थे, लेकिन फिलहाल सिद्दीकी ने अपना निर्णय बदलने से साफ मना कर दिया। कयास लग रहे थे कि क्या वे किसी नई पार्टी में जाएंगे या निर्दलीय राजनीति करेंगे। एक चर्चा यह भी थी कि वह चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी में शामिल हो सकते हैं, लेकिन सिद्दीकी ने सारे कयासों पर विराम लगाते हुए सपा में शामिल होने का निर्णय लिया। कांग्रेस पर क्यों नहीं हमलावर, अब वजह सामने आई
नसीमुद्दीन कांग्रेस पर हमलावर नहीं थे। यहां तक कि कांग्रेस नेता राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी की तस्वीरें तक उनके आवास पर टंगी हैं। इसके अलावा कांशीराम की तस्वीर भी उनके आवास पर टंगी है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा था कि उनकी मंशा कांग्रेस को कमजोर करने की नहीं रही। अब सपा में शामिल होने की खबरों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वे क्यों कांग्रेस पर नरम रहे। यूपी में सपा और कांग्रेस का गठबंधन है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भी यह गठबंधन बना रहेगा, इसका संकेत दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं की ओर से दिया जा चुका है। ऐसे में नसीमुद्दीन पहले से ही सजग थे और ऐसी कोई टिप्पणी कांग्रेस के प्रति नहीं कर रहे थे, जिससे कांग्रेस मुद्दा बनाए। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बारे में पढ़िए रेलवे ठेकेदार से शुरू हुआ था करियर
उत्तर प्रदेश की सियासत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम लंबे समय से चर्चित रहा है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 4 जून 1959 को हुआ। परिवार में कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। मां की बीमारी के चलते सेना की नौकरी छोड़ने के बाद वे रेलवे की ठेकेदारी में सक्रिय हुए। 1990 के आसपास नसीमुद्दीन बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आए। शुरुआत पालिका (नगर पालिका) चुनाव से हुई। 1984 में बसपा में शामिल हुए। 1991 में पहली बार बांदा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे बसपा के पहले मुस्लिम विधायक थे। बसपा सरकार में मिनी सीएम कहलाते थे
बसपा की सभी सरकारों में वे मंत्री बने। साल 2007–2012 की बसपा सरकार में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास 18 मंत्रालय थे और उन्हें मिनी सीएम कहा जाता था। नसीमुद्दीन बसपा में बहन मायावती के सबसे करीबी लोगों में गिने जाते थे। टिकट बंटवारे से लेकर वित्तीय मामलों और पार्टी संगठन में उनका दखल रहता था। 2012–2017 तक वे विपक्ष के नेता भी रहे। 2017 में मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। इसके बाद उन्होंने नई पार्टी बना ली। फिर 2018 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। पार्टी ने उन्हें मुस्लिम चेहरे के तौर पर प्रमोट किया था। कुछ ही दिनों बाद पत्नी-बेटे के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। अब विधानसभा चुनाव से एक साल पहले उन्होंने कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया। ——————- ये खबर भी पढ़ें- ‘कांशीराम साहब का मर्ज…1991 की वो रात नहीं भूलती’:नसीमुद्दीन बोले- भाजपा को हराने के लिए उसकी काट खोजनी होगी ‘1991 की बात है। मैं कांशीराम साहब के साथ फतेहपुर के पुराने पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में रुका था। एक बड़े कमरे में वह सोए, बगल के छोटे कमरे में मैं था। रात करीब 2 बजे नींद टूटी, तो उन्हें कमरे में टहलते और खांसते देखा। तबीयत के बारे में पूछा तो बोले- नींद नहीं आती। दवा की बात की तो कहा- दवा नहीं मिलेगी। फिर बोले- बैठ जा, पहले मर्ज तो समझ ले। ये बातें नसीमुद्दीन सिद्दकी ने दैनिक भास्कर से कहीं। पढ़ें पूरी खबर..