बच्चों की दुनिया कब बन जाती है जानलेवा:गाजियाबाद केस से लें सबक, क्या भारत में बैन है कोरियन लव गेम; जानें पूरा सच

यूपी के गाजियाबाद में 3 नाबालिग बहनों की मौत ने ऑनलाइन कल्चर और डिजिटल लत को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह मामला केवल एक दुखद घटना नहीं, बड़ी सामाजिक चेतावनी बन गया है। आखिर कोरियन डिजिटल कंटेंट में ऐसा क्या है, जो जेन-जी को इतनी तेजी से अपनी ओर खींच रहा? क्या इससे जुड़े गेम भारत में वैध हैं या प्रतिबंधित? कब मनोरंजन की दुनिया बच्चों के लिए मानसिक जोखिम बन जाती है? इन सभी सवालों के जवाब और एक्सपर्ट के सुझाव भास्कर एक्सप्लेनर में पढ़िए… सबसे पहले मामला जान लीजिए…
गाजियाबाद में 3 बहनों निशिका (16), प्राची (14) और पाखी (12) ने फरवरी के पहले हफ्ते नौवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। जांच में सामने आया कि तीनों कोरियन वेब सीरीज, फिल्म, गेम और म्यूजिक में डूबी रहती थीं। वो खुद को पूरी तरह से कोरियन मानती थीं। जब पिता उन्हें रोकने लगा तो जान दे दी। सुसाइड नोट में लिखा…’तुम हमसे कोरियन छुड़ाओगे, कोरियन हमारी जान थी। शादी के नाम से तो हमारे दिल में टेंशन होती थी। हमारी पसंद और प्यार कोरियन कल्चर ही था। इंडिया के आदमी से शादी कैसे करें। नहीं, नहीं, नहीं… बल्कि मर गए तो हमें मौत ही अच्छी लगेगी।’ सुसाइड नोट में बताया कि कोरिया, थाइलैंड, अमेरिका, जापान, चीन की फिल्में, गाने और एक्टर पसंद हैं। इसके अलावा, 5 तरह के गेम और 6 तरह के कार्टून पसंद हैं। इसके साथ ही लिखा- अब तो यकीन हो गया न कि कोरियन हमारी जान है। आखिर कोरियन लव गेम है क्या? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कोरियन गेम कोई एक आधिकारिक या लोकप्रिय मेनस्ट्रीम गेम कैटेगरी नहीं है। इस मामले में जिस गेम का जिक्र सामने आया, उसे अलग-अलग रिपोर्ट्स में ‘Korean Love Game’ या ‘Korean Lover Game’ कहा जा रहा है। नोएडा के साइबर एक्सपर्ट डॉ. रक्षित टंडन के मुताबिक, यह कोई गेम नहीं, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद कोरियन वेब सीरीज, के-पॉप ड्रामा, मूवीज और म्यूजिक है। कोरियन ड्रामा क्या होते हैं? कोरियन ड्रामा दक्षिण कोरिया में बनने वाली टीवी और वेब सीरीज होती हैं। इन्हें आमतौर पर लिमिटेड एपिसोड्स में पूरी कहानी के साथ पेश किया जाता है। इन ड्रामों में रोमांस, परिवार, थ्रिलर और फैंटेसी जैसे सब्जेक्ट को इमोशनल अंदाज में पेश किया जाता है। क्या कोरियन वेब सीरीज या ड्रामा भारत में बैन हैं? नहीं, भारत में कोरियन वेब सीरीज या ड्रामा शोज पर कोई सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बैन नहीं लगाया गया है। ये शो भारत में वैध रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं। लोग इन्हें देखते भी हैं। जेन-जी में है कोरियन कल्चर का क्रेज? एटा जिले का रहने वाला 16 साल का राज (बदला हुआ नाम) कोरियन कल्चर का फैन है। उसके बालों का स्टाइल और पहनावा काफी हद तक कोरियन युवाओं जैसा है। राज का कहना है कि कोरिया के लड़के-लड़कियों की स्किन बहुत ग्लोइंग होती है। वे दिखने में काफी अच्छे लगते हैं। उसके मोबाइल में कोरियन स्टार्स की कई तस्वीरें सेव हैं। राज बताता है कि लड़कों में बीटीएस के शोज देखना, उन्हें सोशल मीडिया पर फॉलो करना और हर अपडेट जानना आम बात है। वहीं, कोरियन गर्ल ग्रुप ब्लैकपिंक भी जेन-Z के बीच काफी लोकप्रिय है। राज मानता है कि वह कई बार रात के 3-4 बजे तक बीटीएस के लाइव या पुराने शोज देखता रहता है। लेकिन, उसे इसमें कुछ गलत नहीं लगता। उसका कहना है कि वे सच में बहुत डैशिंग हैं। उनके जैसा बनने की चाह हर फैन में होती है। कॉलेज में भी आमतौर पर टीनएजर्स बॉलीवुड या हॉलीवुड की बातों से ज्यादा थाई ड्रामा, के. ड्रामा यानी कोरियन ड्रामा, सी. ड्रामा यानी चाइनीज ड्रामा पर डिस्कस करना और उसके बारे में नई-नई चीजें जानना पसंद कर रहे हैं। राज की एक फ्रेंड महिमा (बदला हुआ नाम) तो यहां तक कहती है कि वह बीटीएस आर्मी के लिए समर्पित है। उसकी टी-शर्ट और बैग से लेकर उसके बेड की चादर भी बीटीएस ग्रुप के लड़कों के फोटो छपी है। उसके मम्मी-पापा को भी पता है कि वह कोरियन बैंड पसंद करती है। वे उसकी पसंद पर कुछ नहीं कहते। यंगस्टर कोरियन ड्रामा से क्यों जुड़ते हैं? साइबर एक्सपर्ट डॉ. रक्षित के अनुसार, कोरियन ड्रामा में दिखाया गया ग्लैमर, इमोशनल स्टोरी और परफेक्ट लाइफस्टाइल युवाओं को जल्दी अट्रैक्ट करती है। इन स्टोरीज में एक्टर/एक्ट्रेसेस की भावनाएं, अकेलापन, संघर्ष और रिश्तों से यंगस्टर्स खुद को जोड़ने लगते हैं। वहां के-पॉप सिंगर्स के गाने खासतौर पर यूथ को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं। इन गानों में मजबूत दोस्ती निभाने, एक-दूसरे का साथ देने और अपने सपनों को पूरा करने जैसे पॉजिटिव मैसेज होते हैं। ये युवाओं को गहराई से प्रभावित करते हैं। क्या कोरियन वेब सीरीज बच्चों के लिए खतरनाक हैं? साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि खतरा कोरियन कंटेंट नहीं, खतरा है ज्यादा और बिना गाइडेंस वाला कंटेंट कंजम्प्शन। पेरेंट्स अपने बिजी टाइम में बच्चों को फोन पकड़ा देते थे। इस बात पर ध्यान नहीं देते कि बच्चा क्या देख रहा और क्या कर रहा? बच्चा असल जिंदगी से कटने लगता है और वो अलार्म होता है। लेकिन, माता-पिता इस पर ध्यान नहीं देते हैं। गोरखपुर जिला अस्पताल के साइकेट्रिस्ट डॉ. अमित शाही कहते हैं- डिजिटल दौर में वेब सीरीज और ऑनलाइन गेम सिर्फ मनोरंजन नहीं रहे। ये बच्चों की सोच, व्यवहार और फैसलों को भी प्रभावित करने लगे हैं। खासकर किशोर उम्र के बच्चों पर इसका असर ज्यादा गहरा दिख रहा। किशोरों का दिमाग अभी डेवलप हो रहा होता है। वे जो देखते हैं, उसे जल्दी सच मान लेते हैं। फिक्शन और रियलिटी के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है। वेब सीरीज या गेम बच्चों के दिमाग पर कैसे डालते हैं असर? एक्सपर्ट का कहना है, वेब सीरीज और गेम में दिखाए जाने वाले हिंसक, इमोशनल या फैंटेसी कंटेंट को बच्चे जल्दी सच मान लेते हैं। फिक्शन और रियलिटी के बीच का फर्क धुंधला होने लगता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का एल्गोरिदम भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। एक बार किसी खास तरह का कंटेंट देखने पर उसी से जुड़ी वेब सीरीज, रील्स और गेम बार-बार दिखाए जाते हैं। इससे बच्चा धीरे-धीरे उसी डिजिटल दुनिया में डूबता चला जाता है। ऑनलाइन गेम्स में मौजूद टास्क, लेवल और रिवॉर्ड सिस्टम बच्चों पर मानसिक दबाव बनाते हैं। जीतने और आगे बढ़ने की चाह कई बार लत में बदल जाती है। वहीं, वेब सीरीज के किरदारों से भावनात्मक जुड़ाव बच्चों को असल जिदगी से दूर करने लगता है। इसका सीधा असर बच्चों की नींद, पढ़ाई और पारिवारिक रिश्तों पर पड़ता है। लंबे समय तक मोबाइल इस्तेमाल करने से चिड़चिड़ापन, अकेलापन, गुस्सा और व्यवहार में अचानक बदलाव जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। क्या सच में ऑनलाइन गेम बच्चों को टारगेट करता है? साइबर एक्सपर्ट डॉ. रक्षित टंडन बताते हैं- पहले ब्लू व्हेल गेम जैसा मामला सामने आ चुका है। जिसमें करीब 50 दिनों तक टास्क दिए जाते थे। अंत में खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे कदम उठाने की घटनाएं सामने आई थीं। हालांकि, हर मामले में पूरी तरह समानता होना जरूरी नहीं। लेकिन, टास्क आधारित कंट्रोल और मानसिक दबाव का पैटर्न कई मामलों में मिलता-जुलता दिख सकता है। डॉ. टंडन यह भी साफ करते हैं कि हर कोरियन या ऑनलाइन गेम खतरनाक नहीं होता। दुनियाभर में कई वैध और सुरक्षित गेम खेले जाते हैं। असली खतरा उन अनधिकृत, संदिग्ध और भावनात्मक रूप से हेरफेर करने वाले ऐप्स और ऑनलाइन चैलेंजेस से है। ये बच्चों और किशोरों की मानसिक कमजोरियों को निशाना बनाते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ चैट ग्रुप्स और निजी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए भी बच्चों को टारगेट किए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। जहां उन्हें धीरे-धीरे मानसिक दबाव में लाने की कोशिश की जाती है। डॉ. रक्षित टंडन के मुताबिक आज के समय में 10-11 साल के बच्चे भी 17-18 साल के युवकों के लिए बने ऑनलाइन गेम खेल रहे। पेरेंट्स को इस पर ध्यान रखना होगा। पेरेंटल कंट्रोल जरूरी है। कोरियन कल्चर क्या है? कोरियन कल्चर दक्षिण कोरिया की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान है। यह बीते कुछ सालों में K-Drama, K-Pop, फिल्मों और सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया में तेजी से फैली है। भारत में भी खासकर युवाओं के बीच इसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। कोरियन कल्चर में दोस्ती, परिवार, प्यार, मेहनत और अनुशासन को अहम माना जाता है। K-Drama में स्कूल-कॉलेज लाइफ, रिश्तों और संघर्ष की कहानियां दिखाई जाती हैं। इनसे युवा खुद को आसानी से जोड़ लेते हैं। वहीं K-Pop म्यूजिक, जैसे BTS (एक बॉय बैंड है, जो दोस्ती, मेहनत, मेंटल हेल्थ और सपनों जैसे मुद्दों पर गाने करता है। इसके फैंस खुद को आर्मी कहते हैं। ब्लैकपिंक (Black pink) एक गर्ल ग्रुप है, जो स्टाइल, सेल्फ रिस्पेक्ट और स्ट्रांग महिला छवि के लिए जाना जाता है। इसके गाने और फैशन जेन-Z के बीच खासे लोकप्रिय हैं जो युवाओं से जुड़े मैसेज देते हैं। देश में कोरियन कल्चर की कैसे शुरुआत हुई? कोरियन कल्चर की ओर बढ़ता ट्रेंड कोई अचानक नहीं, धीरे-धीरे बनी सांस्कृतिक स्वीकृति का नतीजा है। इसे हॉल्यू (Hallyu) या कोरियन वेव कहा जाता है। भारत में इसकी शुरुआत साल 2000 में पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर मणिपुर से मानी जाती है। वहां लोगों ने सबसे पहले कोरियन कंटेंट देखना शुरू किया। इसके बाद कोविड काल के लॉकडाउन ने इस ट्रेंड को देशभर में फैलाने का काम किया। घरों में बंद युवाओं ने नेटफ्लिक्स और दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कोरियन ड्रामा और म्यूजिक को मनोरंजन का जरिया बनाया। यहीं से कोरियन कंटेंट की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। आज इस कदर यूथ इसके दीवाने हो चुके हैं कि कोरिया के कल्चर को फॉलो करते हैं। वहां की लाइफस्टाइल को अपनाते हैं। ———————— ये खबर भी पढ़ें… यूपी में चौधरी की नई टीम में फंसा जातीय पेंच, लखनऊ के बाद अब दिल्ली में होगा मंथन भारतीय जनता पार्टी की यूपी इकाई में बड़ा संगठनात्मक फेरबदल अब होली के बाद ही होगा। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की नई टीम को लेकर पहले दौर का मंथन पूरा हो चुका है। लेकिन, जातीय और क्षेत्रीय संतुलन पर पेंच फंसा है। ऐसे में लखनऊ से लेकर दिल्ली तक दूसरे दौर की बैठकों के बाद ही अंतिम मुहर लगेगी। पढ़ें पूरी खबर