काशी हिंदू विश्वविद्यालय में “भारतीय ज्ञान प्रणाली: विभिन्न आयाम” विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन गुरुवार को मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में किया गया। यह सम्मेलन एसपी जैन कॉलेज, सासाराम (बिहार) के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। 19 से 21 मार्च तक चलने वाले इस सम्मेलन में देश-विदेश से आए प्रख्यात विद्वान एवं अकादमिक विशेषज्ञ भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) के विविध आयामों पर विचार-विमर्श करेंगे। पहले दिन अपने संबोधन में कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने भारत को “विश्व के लिए एक पहेली” बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता से पूर्व यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि स्वतंत्र भारत का शासन कठिन होगा या देश खंडित हो सकता है, किंतु भारतीय लोकतंत्र की उल्लेखनीय प्रगति ने इन आशंकाओं को गलत सिद्ध कर दिया है। उन्होंने कहा कि हजारों भाषाओं और विविधताओं के बावजूद देश की एकता और सुदृढ़ता आश्चर्यजनक है, जिसका आधार भारतीय ज्ञान परंपरा है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या यही परंपरा इतनी विविधताओं के बीच एकता का सूत्र है, जहां सूक्ष्म भिन्नताएं व्यापक समन्वय को जन्म देती हैं। विभिन्न विमर्शाें को डिजिटल प्लेटफार्म पर लाएं : कुलपति कुलपति ने विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न शैक्षणिक केंद्रों के माध्यम से अंतरविषयक सहयोग को बढ़ावा देने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि “इस सम्मेलन में होने वाले विमर्शों को पुस्तकों, शोध प्रकाशनों एवं डिजिटल सामग्री के रूप में मूर्त रूप दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य के शोधार्थियों को लाभ मिल सके। उन्होंने शोधार्थीओ को महत्वपूर्ण शोध प्रश्न उठाने का सुझाव दिया तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की “विश्वविद्यालय” की अवधारणा को पुनः रेखांकित करते हुए वैश्विक ज्ञान में योगदान देने और विश्वभर से प्रतिभाओं को आकर्षित करने की प्रतिबद्धता दोहराई।” पं.मदन मोहन मालवीय के उद्देश्यों को दोहराया
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. बालमुकुंद पांडेय, संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति ने भारत की “ज्ञान परंपरा” के पुनर्जीवन के लिए सरकार एवं अकादमिक जगत के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य ऐसे विद्वानों का निर्माण करना होना चाहिए, जो भारतीय चिंतन और सांस्कृतिक मूल्यों में गहराई से निहित हों, न कि केवल औपनिवेशिक ढांचे के अनुरूप पेशेवर तैयार करना। विशिष्ट अतिथि पूर्व सांसद एवं कुलाधिपति, जीएनएसयू, बिहार गोपाल नारायण सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को किसी एक आयाम तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने गुरु के प्रति समर्पण एवं आज्ञाकारिता के महत्व तथा ज्ञान प्राप्ति के लिए जिज्ञासा की अनिवार्यता पर चर्चा की। “भारतीय ज्ञान परंपरा” शब्द को बताया अधिक उपर्युक्त मुख्य वक्ता अध्यक्ष, ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र, सामाजिक विज्ञान संकाय, जेएनयू, प्रो. हीरामन तिवारी ने “भारतीय ज्ञान प्रणाली” के स्थान पर “भारतीय ज्ञान परंपरा” शब्द को अधिक उपयुक्त बताया, क्योंकि यह एक सतत परंपरा है जो संस्थाओं एवं सभ्यताओं को जोड़कर रखती है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के तीन प्रमुख आयाम बताए, भाषा, भाषा के माध्यम से ज्ञान का सृजन, तथा उससे प्राप्त होने वाले परिणाम। उन्होंने महाभारत के उदाहरणों के माध्यम से इन आयामों की व्याख्या की। प्रो. अशोक उपाध्याय, संकाय प्रमुख, सामाजिक विज्ञान संकाय ने कहा कि किसी भी सभ्यता के विकास के लिए इतिहास से सीखना अत्यंत आवश्यक है। अपने संबोधन में प्रो. ए. गंगाथरन ने भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुद्धार की आवश्यकता कि चर्चा करते हुए कहा कि यह किसी एक विषय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा व्यापक और समावेशी है। कार्यक्रम के आरंभ में प्रो. घनश्याम, विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग ने स्वागत भाषण दिया, जबकि डॉ. राम प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।