‘सनक: यूपी के सीरियल किलर’ में आज ऐसे सीरियल किलर की कहानी, जिसे बच्चों को तड़पाकर मारने में मजा आता था। जो हुलिया बदलने में माहिर था। सिर्फ 16 साल की उम्र में करीब 10 दिन में तीन वारदात कीं। पकड़ा भी गया, लेकिन नाबालिग होने की वजह से कम सजा मिली। बाल सुधार गृह से वापस आने पर दोबारा अपराध किए। अबकी पकड़ा गया तो कोर्ट ने कहा- इसे मरते दम तक जेल में रहना होगा। 23 अक्टूबर 2022, दिवाली से ठीक एक दिन पहले की शाम। कन्नौज का गुरसहायगंज कस्बा टिमटिमाती झालरों और कंदीलों से जगमगा रहा था। फुटपाथ पर चूरा, गटिया, खील, खिलौने की दुकानें सजी थीं। कस्बे की पुलिस चौकी में दरोगा मनोज पांडेय ड्यूटी पर थे। शाम करीब 5 बजे वे बाजार का राउंड लेने निकल रहे थे। गेट से बाहर निकले ही थे कि बदहवास सा एक आदमी भागते हुए आया। शायद PWD गेस्ट हाउस का चौकीदार था। हांफते हुए बोला- “साब, जल्दी चलिए, डाक बंगले के पीछे एक बच्ची पड़ी है। सिर फटा हुआ है, एकदम खून-खच्चर है…। बहुत सीरियस है” मनोज ने बिना देर किए मोटरसाइकिल उठाई और निकल पड़े। मौके पर पहुंचे तो देखा लोगों की भीड़ जमा है। 10-12 साल की बच्ची खून में लथपथ पड़ी है, कराह रही है। हाथ उठा-उठाकर मदद मांग रही है, लेकिन लोग वीडियो बना रहे हैं। फोटो खींच रहे हैं। मनोज का खून खौल गया। वे लगभग चीखते हुए बोले- “कुछ दया-शरम है तुम लोगों में कि सब बेच खाई है। तुम्हारे घर की बच्ची के साथ ऐसा होता तब भी ऐसे वीडियो बनाते रहते? बंद करो मोबाइल…।” कुछ ने फोन बंद कर लिए, लेकिन कुछ अभी भी चुपके से वीडियो बना रहे थे। मनोज की नजर एक लड़के पर पड़ी। उन्होंने मोबाइल छीना और जमीन पर पटक दिया। आंखें तरेरकर उसकी ओर देखा तो लड़का भाग गया। मनोज ने फिर चीखकर पूछा- “एम्बुलेंस को फोन किया किसी ने…?” सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मनोज ने बच्ची को गोद में उठाया और सड़क की तरफ दौड़ पड़े। एक ऑटो रिक्शा रुकवाया और अस्पताल चलने को कहा। सड़क पर काफी भीड़ थी। मनोज और ऑटो ड्राइवर लगातार चिल्ला रहे थे- “हट जाओ, रास्ता दो… इमरजेंसी है…।” जैसे-तैसे अस्पताल पहुंचे, इलाज शुरू हुआ। डॉक्टर ने कहा- “बच्ची की हालत नाजुक है। प्राइवेट पार्ट पर भी चोटें हैं। फौरन मेडिकल कॉलेज ले जाइए।” अब-तक बच्ची के घरवाले भी अस्पताल पहुंच चुके थे। मां रेहाना का रो-रोकर बुरा हाल था। साथ आई औरतें उसे संभाल रही थीं। पिता अफजल चुपचाप एक तरफ खड़े थे। मेडिकल कॉलेज वहां से 20-25 किलोमीटर दूर था। दारोगा मनोज पांडेय ने एम्बुलेंस के बारे में पूछा तो डॉक्टर बोले- “सर, एम्बुलेंस तो है, लेकिन ड्राइवर नहीं है।” मनोज ने चिढ़कर कहा- “कोढ़ में खाज होने वाला हाल है। चाबी कहां है एम्बुलेंस की, मैं ही लेकर जाता हूं।” मनोज ने आला अफसरों को जानकारी दी और बच्ची के मां-बाप के साथ तिर्वा मेडिकल कॉलेज चल दिए। पुलिस-प्रशासन के सभी बड़े अधिकारी मेडिकल कॉलेज पहुंच चुके थे। डॉक्टरों की टीम तैयार थी। बच्ची को ICU के स्पेशल वार्ड में रखा गया। वो पूरी रात बेहोश रही। सुबह उसे कानपुर के हैलेट हॉस्पिटल रेफर कर दिया गया। बच्ची अब भी बेहोश थी। हैलेट हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने बताया, वो कोमा में चली गई है। ये सुनते ही रेहाना फफक पड़ी। अफजल कांपती आवाज में बोला- “या अल्लाह! कैसे कराएंगे गुड़िया का इलाज… यहां तो दाल-रोटी ही मुश्किल से चलती है।” अफजल की आंखें गीली थीं। वे गुरसहायगंज बाजार में चाट का ठेला लगाते थे। मौजूद अफसरों ने अफजल और रेहाना को ढांढ़स बंधाया। बोले- “गुड़िया हमारी जिम्मेदारी है। उसे बेहतर से बेहतर इलाज मिलेगा। आप फिक्र मत कीजिए।” आनन-फानन में एक कमेटी बनी। चंदा इकट्ठा हुआ, शाम तक छह लाख रुपए जमा हो गए। गुड़िया के और बेहतर इलाज के लिए उसे कानपुर के प्राइवेट अस्पताल, रीजेंसी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। इधर पुलिस ने छानबीन शुरू कर दी थी। गुड़िया के चाचा ने पूरी घटना बताई- “गुड़िया मेले से दो गुल्लक लाई थी, उसमें से एक चिटकी निकल गई। वही बदलने बजार गई थी। दो-तीन घंटे बाद भी गुड़िया घर नहीं लौटी तो इधर-उधर ढूंढा, लेकिन कुछ पता नहीं चला। शाम को खबर मिली कि ऐसा-ऐसा हो गया।” पूरे जिले में ये खबर फैल चुकी थी। तमाम वीडियो वायरल थे। लोग गुस्से में थे। SP साहब ने मनोज पांडेय को ही केस सौंपा दिया। पड़ताल शुरू हुई। गुड़िया के घर से बाजार तक के रास्ते में हर एक मोहल्लेवाले, दुकानदार, ठेल-खोमचेवाले से पूछताछ हुई। CCTV कैमरे खंगाले गए। काफी मशक्कत के बाद एक सुराग मिला। एक फुटेज में गुड़िया किसी लड़के के पीछे जाती दिखाई दी। घरवाले उस लड़के को नहीं जानते थे। पुलिस का शक गहराया। एक बार फिर पूछताछ का दौर शुरू हुआ। इस बार लड़के की फोटो दिखाकर कोई कड़ी खोजने की जुगत हो रही थी। जांच और पूछताछ का सिलसिला आस-पड़ोस के जिलों तक पहुंचा। इसी दौरान फर्रुखाबाद जिले में किसी ने उस लड़के को पहचान लिया। “अरे! ये तो रामजी है, खुदागंज वाला रामजी वर्मा… एक नंबर का बदमाश है। पहले भी सजा काट चुका है।” पुलिस के पास अब उस चेहरे का नाम था… रामजी वर्मा, निवासी- गांव खुदागंज, जिला फर्रुखाबाद। कुंडली निकाली गई। रामजी के काले कारनामे केस डायरी से बाहर आने लगे… केस नंबर- 1 23 फरवरी 2018, जिला- फर्रुखाबाद…। रामजी वर्मा की नजर आठ साल के सोनू पर पड़ी। टॉफी देने के बहाने वो सोनू को अपने साथ ले गया। रेप करने के बाद गला दबाकर मार दिया। लाश कमालगंज सब्जीमंडी के पास फेंक दी। केस नंबर- 2 2 मार्च 2018, जिला- कन्नौज, गांव सादिकापुर। होली का दिन… 5 साल का गोलू घर के पास खेल रहा था। रंगों में चेहरा छुपाए रामजी वर्मा गोलू को बहलाकर साथ ले गया। इधर, गोलू के घरवाले उसे ढूंढते-ढूंढते परेशान हो गए। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। दो दिन बाद घर के पीछे एक बोरी में गोलू की लाश मिली। शरीर पर कपड़ों की जगह चोट के गहरे निशान थे। इसके साथ भी घिनौनी हरकत की गई थी। केस नंबर- 3 3 मार्च 2018, जिला- कन्नौज, गांव खाड़ेदेवर। नौ साल की रेनू घर के बाहर खेल रही थी। रामजी वर्मा गांववालों की नजरें बचाकर बहाने से उसे अपने साथ ले आया। गांव के बाहर लाकर रेप करने की कोशिश की। रेनू ने चिल्लाना शुरू किया तो उसके सिर पर पत्थर मारकर भागने लगा। खेतों में काम कर रहे लोगों ने आवाज सुनी तो दौड़ पड़े। रामजी पकड़ा गया। खूब धुनाई हुई, फिर पुलिस के हवाले कर दिया गया। रेनू मरते-मरते बची थी। अगले दिन यानी 4 मार्च को छिबरामऊ कोर्ट में पेशी हुई। पता चला रामजी वर्मा की उम्र सिर्फ 16 साल है। मामला जुवेनाइल कोर्ट (किशोर न्याय बोर्ड) भेज दिया गया। रामजी नाबालिग था, लेकिन शातिर इतना कि बड़े-बड़े अपराधी पीछे छूट जाएं। पेशी से लौटते वक्त पुलिस को चकमा देकर भाग गया। प्रशासन की बड़ी बदनामी हुई। पुलिस को खूब छकाने के बाद फिर से पकड़ा गया। केस चला, नाबालिग था इसलिए कम सजा हुई। सालभर बाद बाल सुधार गृह से छूट गया। अब लौटते हैं 23 अक्टूबर 2022 के कन्नौज वाले केस पर। पुलिस रामजी वर्मा की तलाश कर रही थी। पुलिस को भी अब ये साफ पता चल गया था कि रामजी वर्मा कोई सामान्य अपराधी नहीं, बल्कि सीरियल किलर है। ये छोटे बच्चों को ही अपना शिकार बनाता है। इस जानकारी के बाद पुलिस सुपर एक्टिव हो चुकी थी। पोस्टर छपवाए गए, एक लाख रुपए का इनाम घोषित हुआ। न्यूज चैनल्स पर रामजी की फोटो फ्लैश होने लगी, छापेमारियां हुईं। रामजी वर्मा के बारे में रोज कोई नई बात पता चल रही थी। गांववालों ने बताया कि मोबाइल पर क्राइम सीरियल देखता रहता था। तंबाकू के अलावा किसी तरह नशा नहीं, बोलचाल में बेहद जहीन, होटल में वेटर वगैरह के काम में परफेक्ट…। रामजी के बारे में काफी कुछ पता चला था, लेकिन रामजी का कहीं पता नहीं लग रहा था। एक जिले से दूसरे जिले, तीसरे जिले… यूपी से राजस्थान, एमपी, साउथ में हैदराबाद तक दौड़ हुई। कोई सुराग, कोई टिप नहीं छोड़ रही थी पुलिस, लेकिन आठ महीने बाद भी हाथ खाली थे। आखिरकार 22 जून 2023 की शाम एक टिप मिली। रामजी वर्मा छिबरामऊ तहसील से अपने घर खुदागंज की ओर जाता देखा गया। पुलिस ने घेराबंदी की, पीछा किया। पुलिस देखकर रामजी भाग खड़ा हुआ। एक खेत में जाकर ट्यूबवेल के पीछे छिप गया और तमंचे से फायरिंग करने लगा। जवाब में पुलिस ने भी गोली चलाई। एक गोली उसके पैर में लगी और पकड़ा गया। सीरियल किलर रामजी वर्मा पुलिस की गिरफ्त में था। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पूछताछ शुरू हुई। बिना किसी कड़ाई के उसने सारे गुनाह कुबूल कर लिए। पुलिस ने ठान लिया था कि इसे जल्द से जल्द सजा दिलानी है। तय समय के भीतर चार्जशीट दाखिल हुई, ट्रायल शुरू हुआ। अब बारी गवाही की थी। रामजी वर्मा को गुड़िया के सामने नहीं लाया गया। फोटो से पहचान कराई गई। फोटो देखते ही गुड़िया सहम गई। सरकारी वकील नवीन दुबे ने प्यार से पूछा: बताओ बेटा, उस दिन क्या हुआ था?
गुड़िया: हम गुल्लक बदलने गए थे।
नवीन दुबे: कहां से?
गुड़िया: सब्जीमंडी के पास। वहीं एक अंकल मिले।
नवीन दुबे: उन्होंने क्या कहा? गुड़िया: बोले, कहां जा रही हो? हमने बताया, दुकानदार ने खराब गुल्लक दी है, वही बदलने जा रहे हैं।
नवीन दुबे: फिर?
गुड़िया: अंकल ने कहा, चलो हम नई गुल्लक दिलवा देते हैं।
नवीन दुबे: और तुम उनके साथ चली गईं? गुड़िया: हां, लेकिन अंकल ने गुल्लक नहीं दिलाई। वो हमें झाड़ी में ले गए। हमारे कपड़े उठाने लगे, नीचे छूने लगे।
नवीन दुबे (धीरे से): तुमने क्या किया?
गुड़िया (भरे गले से): हमने मना किया तो वो मारने लगे। फिर एक पत्थर उठाकर मेरे सिर पर मार दिया। उसके बाद हम बेहोश हो गए। जिस किसी ने गुड़िया की कांपती आवाज में ये गवाही सुनी उसकी आंखें भर आईं। गुड़िया अभी भी उस दरिंदे को अंकल कह रही थी, लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी। गुड़िया का इलाज करने वाले डॉक्टर ने जो बताया उसे सुनकर लोगों की रूह कांप गई। डॉक्टर ने बताया- “बच्ची की पूरी बॉडी पर घाव थे। सिर के पीछे की हड्डी टूटी थी। चेहरा खून और चोटों से भरा था। शरीर पर जगह-जगह खरोंच के गहरे निशान थे। ऐसा लग रहा था किसी जानवर ने नोचा है। इतने टांके लगे थे कि गिनना मुश्किल था। बच्ची के सीने और प्राइवेट पार्ट पर भी चोटें थीं।” बोलते-बोलते डॉक्टर का गला रुंध गया, आंखों में नमी थी। कोर्ट में सन्नाटा छा गया। सरकारी वकील ने कुछ और सबूत पेश किए। गुड़िया के नाखून में कुछ बाल फंसे मिले थे। इसका DNA रामजी वर्मा से मैच हुआ। CCTV फुटेज और पुराने अपराधों की रिपोर्ट पेश की गई। आखिरकार रामजी वर्मा दोषी करार दिया गया। 15 दिसंबर 2023, पॉक्सो कोर्ट की स्पेशल जज अलका यादव ने फैसला पढ़ना शुरू किया- “रामजी वर्मा समाज की आत्मा पर चोट है। इसके साथ किसी तरह की नरमी, न्याय के साथ अन्याय होगा। पॉक्सो एक्ट के तहत ये अदालत रामजी वर्मा को उम्रकैद की सजा सुनाती है। ये समाज के लिए खतरा है, इसलिए जिंदगी की आखिरी सांस तक इसे जेल में ही रखा जाए।” रामजी वर्मा कटघरे में खड़ा सब सुन रहा था। न डर, न पछतावा… मानो उसके लिए ये अपराध बस एक घटना भर थी। रामजी वर्मा इस समय कन्नौज जेल में बंद है और अपने पाप की सजा भुगत रहा है। **** (नोट- ये रियल स्टोरी पुलिस चार्जशीट, केस से जुड़े वकील और स्थानीय लोगों से बातचीत पर आधारित है। पहचान छिपाने के लिए पीड़ित पक्ष के नाम बदले गए हैं। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल करके लिखा गया है।)