लखनऊ के संगीत नाटक अकादमी में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भरत रंग, लखनऊ ने बुंदेलखंड की प्रसिद्ध लोककथा पर आधारित ऐतिहासिक नाटक ‘लाला हरदौल’ प्रस्तुत किया। नाटक का लेखन महेंद्र भीष्म ने किया है, जबकि इसका निर्देशन चन्द्रभाष सिंह ने किया। ‘लाला हरदौल’ बुंदेलखंड की वीरता और त्याग की एक प्रतिष्ठित कहानी है, जो लगभग 1684 के समय की है। यह ओरछा के महाराजा श्री जुझार सिंह जूदेव के छोटे पुत्र हरदौल की जीवनगाथा है। यह नाटक दर्शकों को भाईचारे, बलिदान और परिवार के प्रति निष्ठा का संदेश देता है, जिसमें वीरता, देशभक्ति, षड्यंत्र और आस्था के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं। हरदौल ने अपनी बहादुरी से सेना को परास्त किया नाटक में हरदौल को जुझार सिंह अपने पुत्र समान मानते हैं, जबकि उनके मंझले भाई पहाड़ सिंह और छोटे भाई प्रतीत राय उनसे ईर्ष्या करते हैं। मुगल आक्रमण के दौरान हरदौल ने अपनी बहादुरी से सेना को परास्त किया। हालांकि, दरबार में फन्ने खाँ और अब्दुल्ला खाँ ने षड्यंत्र रचते हुए हरदौल के चरित्र पर सवाल उठाए। परिणामस्वरूप, जुझार सिंह ने हरदौल को विष देकर अपनी निष्ठा साबित करने का निर्णय लिया। हरदौल ने अपनी माँ समान भाभी चंपावती के सम्मान की रक्षा के लिए विष ग्रहण कर लिया। उनके भक्त सांवला डोम ने भी उनके वियोग में प्राण त्याग दिए। प्रमुख कलाकारों ने हिस्सा लिया प्रस्तुति में बुंदेलखंड की लोककला, नृत्य और संगीत का भरपूर प्रयोग किया गया। मंच पर कलाकारों ने अद्भुत अभिनय किया, जिसमें विकास दुबे ने हरदौल, जूही कुमारी ने रानी चंपावती, चन्द्रभाष सिंह ने जुझार सिंह, अभिषेक कुमार सिंह ने पहाड़ सिंह और मोहन सोनी ने सांवला डोम की भूमिका निभाई। राई नृत्य और लोक रंगों की सजावट विशेष आकर्षण का केंद्र रही, जिसने दर्शकों को पूरी प्रस्तुति में बांधे रखा।