यूपी में मायावती के साथ आ सकते हैं ओवैसी:बिहार में जीते बसपा विधायक ने AIMIM का पोस्टर लगाया

बिहार में एनडीए की प्रचंड जीत के बीच भी बसपा खाता खोलने में सफल रही। वहीं, इस लहर में सीमांचल में AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) भी 5 सीट जीतने में सफल रही। लेकिन, चर्चा बिहार से वायरल हो रही एक तस्वीर की है। ये तस्वीर बसपा के बिहार की रामगढ़ विधानसभा से जीते इकलौते विधायक सतीश उर्फ पिंटू यादव की है। उनके साथ बसपा के बिहार स्टेट प्रभारी अनिल चौधरी भी मौजूद हैं। चुनाव जीतने के बाद पिंटू यादव मीडिया से बात कर रहे थे। उनके पीछे दो तस्वीर लगी थीं। पहली बसपा की और दूसरी AIMIM की। इस तस्वीर ने चर्चा तेज कर दी है कि क्या यूपी में बसपा-AIMIM साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में है? दोनों के बीच गठबंधन की कितनी संभावना है? यूपी में दोनों में गठबंधन हुआ तो कितना फायदेमंद होगा? पढ़िए ये रिपोर्ट… पहले बिहार में दोनों पार्टियों का प्रदर्शन जानिए- खबर में आगे बढ़ने से पहले इस पोल पर अपनी राय दीजिए… बसपा का प्रदर्शन : बसपा ने बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। हालांकि, चुनाव में वह 181 सीटों पर ही लड़ी। कई सीटों पर बीच में प्रत्याशियों ने साथ छोड़ दिया। बिहार की जिम्मेदारी राज्यसभा सांसद रामजी गौतम के साथ मायावती के भतीजे आकाश आनंद को सौंपी गई थी। आकाश ने बिहार में 6 से अधिक रैली और नुक्कड़ सभाएं की थीं। बसपा का पूरा फोकस यूपी से सटे कैमूर और रोहतास जिलों पर था। दोनों जिलों में बसपा ने 7 सीटों पर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है। कैमूर जिले की रामगढ़ सीट सतीश कुमार यादव उर्फ पिंटू यादव कांटे के मुकाबले में 30 मतों के अंतर से जीतने में सफल रही। बसपा का वोट प्रतिशत 2020 की तुलना में 1.02% बढ़कर 1.62% तक पहुंचा है। बसपा ने रामगढ़ के अलावा करगहर विधानसभा पर जदयू को कड़ी टक्कर दी। यहां पार्टी प्रत्याशी उदय प्रताप सिंह 56 हजार से ज्यादा वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। महागठबंधन में शामिल कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही। जबकि मोहनिया, भभुआ, चैनपुर, बक्सर और राजपुर विधानसभा सीटें महागठबंधन बसपा की दमदार प्रदर्शन के चलते हारी। इन सीटों की त्रिकोणीय लड़ाई में एनडीए जीतने में सफल रही। एआईएमआईएम का प्रदर्शन : एआईएमआईएम ने बिहार में 25 सीटों पर चुनाव लड़ा। 5 सीटें अमौर, बहादुरगंज, कोचाधामन, जोकीहाट और बेतिया जीतने में सफल रही। वहीं, बलरामपुर और ठाकुरगंज में दूसरे नंबर पर रही। जबकि AIMIM की वजह से महागठबंधन को 4 सीटों प्राणपुर, कसबा, अररिया, कोटी पर हार का सामना करना पड़ा। AIMIM का वोट शेयर 2020 की तुलना में 1.25% से बढ़कर 1.85% हो गया। उसे कुल 9,30,504 वोट मिले हैं। दोनों दलों के बीच गठबंधन की कितनी संभावनाएं?
यूपी विधानसभा चुनाव बसपा के अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है। 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा में बसपा का यूपी में सबसे बुरा प्रदर्शन रहा। लेकिन, मायावती ने पिछले कुछ महीनों से अपनी सक्रियता बढ़ाते हुए यूपी चुनाव को लेकर रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं। 9 अक्टूबर की रैली के बाद बसपा कार्यकर्ताओं का भी जोश हाई हुआ है। बसपा और AIMIM 2020 में बिहार में गठबंधन में चुनाव लड़ चुके हैं। इस बार के चुनाव में भी असदुद्दीन ओवैसी ने सार्वजनिक अपील की थी कि जहां AIMIM के प्रत्याशी नहीं लड़ रहे हैं। वहां उनके समर्थक बसपा प्रत्याशी के पक्ष में वोट करें। दूसरे मायावती यूपी के संदर्भ में पहले ही कह चुकी हैं कि वह किसी बड़ी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। छोटे और समान विचारधारा वाली पार्टियों से कुछ सीटों पर समझौता हो सकता है। मतलब साफ है कि ओवैसी के साथ यूपी में बसपा का गठबंधन होने में कोई पेंच नहीं फंसेगा। बिहार में जिस तरीके से बसपा के जीते इकलौते विधायक पिंटू यादव और स्टेट प्रभारी अनिल चौधरी की मौजूदगी में बसपा के बैनर के साथ AIMIM का बैनर लगा है। इससे साफ है कि दोनों दलों के बीच यूपी के संदर्भ में कुछ न कुछ खिचड़ी पक रही है। दोनों दलों का बैनर एक साथ बिना मायावती की मर्जी से नहीं लग सकता है। बिहार में AIMIM 5 सीटों पर जीता है। बसपा का एक विधायक है। मतलब दोनों दल मिलकर विधानसभा में विपक्ष की आवाज उठाएंगे। यूपी में गठबंधन हुआ तो कितना फायदेमंद होगा?
राजनीति के जानकार कहते हैं कि यूपी में बसपा और AIMIM गठबंधन में उतरते हैं, तो दोनों को फायदा मिलेगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने यूपी में 100 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। हालांकि, सिर्फ एक प्रत्याशी अपनी जमानत बचा पाया था। तब मुस्लिमों का अधिकांश समर्थन सपा को मिला था। ओवैसी की यूपी में रैलियों और सभाओं में बड़ी संख्या में मुस्लिम उमड़ते थे। उनकी पार्टी को यूपी में करीब 4.50 लाख वोट मिले थे। तब वे बिना किसी गठबंधन के चुनाव में उतरे थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 12.88 फीसदी वोट मिले थे। बसपा प्रमुख मायावती पिछले कुछ समय से पार्टी के साथ मुस्लिमों को जोड़ने की कवायद तेज कर दी है। उनकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों उन्होंने पहली बार मुस्लिम भाईचारा कमेटी की प्रदेश स्तरीय बैठक खुद ली। उन्होंने खुलकर मुस्लिमों से अपील की कि वह उनका साथ दें, तो वह भाजपा को सत्ता से उखाड़ देंगी। यूपी में दलित जहां 20 फीसदी के लगभग हैं, वहीं मुस्लिम आबादी भी 19 फीसदी के लगभग हैं। 2024 के लोकसभा में जो दलित बसपा से दूर चले गए थे, वो 9 अक्टूबर की रैली के बाद फिर से बसपा की ओर लौटने लगे हैं। जाहिर सी बात है कि दलितों के लौटने से बसपा की ताकत बढ़ेगी। इस ताकत में ओवैसी की मदद से यदि मुस्लिमों का समर्थन भी जुड़ गया तो दोनों मिलकर पश्चिमी यूपी की मुस्लिम-दलित बहुल कई सीटों पर बड़ा उलटफेर कर सकते हैं। पश्चिम के बदले राजनीतिक समीकरण में ये कितना कारगर होगा
वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि कभी पश्चिम में जाट-मुस्लिम समीकरण निर्णायक होता था। चौधरी चरण सिंह से लेकर अजीत सिंह के जमाने तक ये समीकरण प्रभावी रहा। लेकिन, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे ने जाट-मुस्लिम समीकरण को तोड़ दिया। इस समीकरण के टूटने से ही पश्चिम में लोकदल की ताकत घटती चली गई। बसपा के समय पश्चिम में पहली में मुस्लिम-जाटव समीकरण सफल हुआ था। अब मायावती एक बार फिर जाटव-मुस्लिम समीकरण को मजबूत करने में जुटी है। इसमें ओवैसी बड़े मददगार साबित हो सकते हैं। वैसे भी बसपा के पास आज की तारीख में ऐसा कोई बड़ा मुस्लिम चेहरा नहीं है, जिसकी अपील ओवैसी जैसी हो। इसकी एक और वजह भी है। पश्चिम में यादव मतदाताओं की संख्या काफी कम है। पूर्वांचल से लेकर अवध और ब्रज क्षेत्र में यादव-मुस्लिम समीकरण प्रभावी है। मैनपुरी, कन्नौज, इटावा, फर्रुखाबाद, एटा, आगरा, हाथरस, अलीगढ़ में यादव आबादी निर्णायक मानी जाती है। लेकिन जैसे-जैसे पश्चिम और रूहेलखंड की ओर बढ़ते हैं यादव आबादी घटती जाती है। ऐसे में ये समीकरण इतना प्रभावी नहीं रह जाता। वहां एनडीए खासकर भाजपा को हराने के लिए जाटव-मुस्लिम या जाट-मुस्लिम समीकरण ही विकल्प बचता है। लोकदल मौजूदा समय में एनडीए गठबंधन का हिस्सा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी जाट हैं। ऐसे में मुस्लिम-जाट का समीकरण बनने से रहा। बचा सिर्फ जाटव-मुस्लिम समीकरण ही है। मायावती इसे ओवैसी की मदद से साध सकती हैं। सपा के साथ क्यों नहीं हो सकता है गठबंधन
एक सवाल ये भी आ सकता है कि ओवैसी यूपी में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सपा के साथ गठबंधन क्यों नहीं करेंगे? इसका जवाब असदुद्दीन खुद दे चुके हैं। वे साफ कर चुके हैं कि उनका गठबंधन भाजपा-कांग्रेस को छोड़कर किसी से भी हो सकता है। सपा का यूपी में अभी कांग्रेस के साथ गठबंधन है। सपा ने बिहार में किसी भी सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारा था। इसके बावजूद महागठबंधन के प्रत्याशियों के पक्ष में अपने मुस्लिम चेहरों अफजाल अंसारी, इमरान प्रतापगढ़ी, इकरा हसन को सीमांचल में उतारा था। इन चेहरों ने जमकर ओवैसी के खिलाफ बोला था। इस वजह से भी सपा के साथ आने में ओवैसी परहेज करेंगे। दूसरा खुद सपा ये नहीं चाहती है कि यूपी में उसके रहते मुस्लिमों का कोई और नुमाइंदगी करने वाला दल पनपे। ओवैसी की पूरी राजनीति ही मुस्लिम के इर्द-गिर्द रहती है। ओवैसी यूपी में मजबूत हुए तो सपा का कमजोर होना तय है। ऐसे में ओवैसी के लिए भी बसपा के साथ गठबंधन करना ही मजबूत विकल्प होगा। दोनों दलों में गठबंधन होगा, अभी इस पर दोनों ही पार्टी की ओर से कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। बसपा से जुड़े प्रदेश स्तर के एक पदाधिकारी से बात की, तो कहा गया कि इस तरह का निर्णय पार्टी सुप्रीमो मायावती ही करेंगी। वहीं AIMIM के शौकत अली से बात की, ताे उन्होंने भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर मामला डाल दिया। ————————– ये खबर भी पढ़ें… यूपी में केशव का कद बढ़ेगा, टूट सकती है अखिलेश-राहुल की जोड़ी, जानिए बिहार नतीजों का असर बिहार चुनाव में NDA ने रिकॉर्ड जीत हासिल की है। BJP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इसका असर अब यूपी में पंचायत चुनाव से लेकर 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है। BJP पर सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल (S), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), निषाद पार्टी का दबाव कम होगा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार के नतीजों के बाद यूपी में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा को नए सिरे से अपनी रणनीति पर विचार करना होगा। अखिलेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ अपनी शर्तों पर गठबंधन करेंगे। पढ़ें पूरी खबर