उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले के बिगुल को GI (जीओ ग्राफिकल इंडिकेटर) टैग मिला है। बिगुल एक वाद्ययंत्र है, जो किसी भी आंदोलन/कार्यक्रम की शुरुआत के लिए बजाया (फूंका) जाता है। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध का बिगुल फूंकना हो या RSS के पहले स्थापना दिवस पर बिगुल बजाना। मेरठ का बिगुल ही हर जगह इस्तेमाल हुआ। देश की ज्यादातर आर्म्ड फोर्सेज के बैंड में आज मेरठ का बिगुल शामिल है। GI टैग मिलने के बाद इसे बनाने वालों को अब क्या संभावनाएं नजर आती हैं? बिगुल का इतिहास क्या है? ये समझने के लिए दैनिक भास्कर मेरठ की जली कोठी में पहुंचा। यहां से दुनियाभर के लिए वाद्य यंत्र बनाए और सप्लाई किए जाते हैं। पूरी रिपोर्ट पढ़िए… मेरठ में 140 साल पुरानी पहली फैक्ट्री
मेरठ के जली कोठी एरिया में नादिर अली एंड कंपनी है। इसी कंपनी ने सबसे पहले वाद्य यंत्र बनाना शुरू किया था। बिगुल का इतिहास समझने के लिए हम इसी कंपनी में पहुंचे। कंपनी के डायरेक्टर फैज आफताब बताते हैं- अंग्रेजों के वक्त से बिगुल इस्तेमाल होता रहा है। जब भी किसी वॉर में जाते हैं, मेहमान आते हैं तो उनके लिए बजाया जाता था। एक तरह से ये बिगुल पूरे बैंड को लीड करता था। इसका इतिहास वैसे तो अंग्रेजों के समय का है। लेकिन, 1885 में मेरठ में हमारे दादा नादिर अली ने एक छोटी यूनिट लगाकर बिगुल बनाना शुरू किया था। बिगुल और ट्रम्पेट (तुरही) से इसकी शुरुआत हुई थी। देश की आजादी के वक्त भी स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ यही बिगुल बजाया था। 1971 में भारत-पाक वॉर हुआ, तब सेना के फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ मेरठ आए। उनके साथ आर्मी के सब एरिया कमांडर और मेरठ जिला प्रशासन के अधिकारी भी थे। उस वक्त उन्होंने हमारी फर्म पर आकर सेना के लिए बिगुल खरीदे थे। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के पहले स्थापना दिवस पर जो बिगुल बजाया गया था, वो भी मेरठ की इसी फर्म से गया था। कैसे बनता है बिगुल, समझिए
ब्रास शीट को काटकर उसे हाथ से पीटा जाता है और बिगुल का आकार दिया जाता है। बिगुल की स्पेशल डाई होती है। उसी डाई के ऊपर ब्रास सीट को मोल्ड किया जाता है। इसके कई प्रोसेस हैं, तब ये फिनिशिंग लेवल तक जाता है। उसके बाद माउथ पीस को उस बिगुल में एड-ऑन किया जाता है, तब जाकर वो बज पाता है। फिलहाल तीन तरह के बिगुल बन रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा डिमांड कॉपर के बिगुल की है, जो पूरे हिंदुस्तान में हॉट सेलिंग है। दूसरा गोल्ड लेकर बिगुल है। मतलब उसके ऊपर पूरी फिनिशिंग गोल्ड जैसी है। तीसरा सिल्वर लेकर बिगुल है, जो ऑन डिमांड बनता है। निर्माता बोले- GI टैग से बाहरी मार्केट को मेरठ का इजी एक्सेस मिलेगा
बिगुल निर्माता फैज आफताब ने बताया- अब हिंदुस्तान में कहीं भी कोई भी व्यक्ति अगर गूगल पर बिगुल टाइप करेगा तो स्क्रीन पर मैन्युफैक्चरिंग हब मेरठ आएगा। वहां बिगुल की ए-टू-जेड सारी जानकारी उपलब्ध होगी। इसलिए GI टैग से हमारे लिए बाहर की मार्केट अब इजी एक्सेस हो गई हैं। किसी को बिगुल लेना है, तो सीधा गूगल सर्च करके हम तक पहुंच सकता है। फिलहाल बिगुल का मार्केट आर्म्ड फोर्सेज, पुलिस और पैरा मिलिट्री फोर्सेज में है। इसके अलावा अब स्कूल-कॉलेज से भी इसकी डिमांड आना शुरू हो गई है। हर स्कूल में एक बैंड बन गया है। उस बैंड में बिगुल भी शामिल है। क्या होता है GI टैग? किसी भी रीजन का जो क्षेत्रीय उत्पाद होता है, उससे उस क्षेत्र की पहचान होती है। जब उस उत्पाद की ख्याति दुनियाभर में फैलती है, तब उसे प्रमाणित करने की एक प्रक्रिया होती है। इसे GI यानी जीओ ग्राफिकल इंडिकेटर कहते हैं। हिंदी में इसे भौगोलिक संकेतक भी कहा जाता है। संसद में उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर-1999 में अधिनियम पारित हुआ था। इस अधिनियम का नाम जीओ ग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स एक्ट-1999 रखा गया था। इसे 2003 में लागू किया गया। इसके तहत भारत में पाए जाने वाले प्रोडक्ट के लिए GI टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ। GI टैग हासिल करने के लिए उस उत्पाद को बनाने वाली एसोसिएशन अप्लाई करती है। इसे अप्लाई करते वक्त ये बताना होता है कि उस उत्पाद को GI टैग क्यों दिया जाए? मतलब प्रोडक्ट की यूनीकनेस, ऐतिहासिक विरासत के बारे में प्रूफ देना होता है। दुनियाभर में बजते हैं मेरठ के वाद्ययंत्र
मेरठ का वाद्य यंत्र उद्योग, खासकर ब्रास बैंड और हवा वाले यंत्र विश्व प्रसिद्ध है। ये करीब 200 साल पुराना है। यहां के कारीगर उच्च गुणवत्ता वाले ट्रम्पेट (तुरही), बिगुल, ड्रम और अन्य पीतल और तांबे के वाद्ययंत्र बनाते हैं। ये भारत के साथ दुनियाभर के कई देशों में निर्यात होते हैं। देश-विदेश की सेना भी इन्हें उपयोग करती है। ट्रम्पेट, बिगुल, ड्रम, यूफोनियम, सूसाफोन जैसे कई तरह के वाद्ययंत्र यहां बनते हैं, जिनमें से 90% बड़े आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले वायु वाद्ययंत्र मेरठ में ही बनते हैं। यहां के वाद्ययंत्र न केवल पूरे भारत में, बल्कि सऊदी अरब, कतर, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में भी निर्यात होते हैं और ब्रिटिश सेना व बकिंघम पैलेस में भी इस्तेमाल हुए हैं। ————————– क्या आप हैं यूपी के एक्सपर्ट? खेलिए और जीतिए 1 करोड़ तक के इनाम यूपी से जुड़े 3 आसान सवालों के जवाब दीजिए और जीतिए 1 करोड़ तक के इनाम। हर दिन 50 लोग जीत सकते हैं आकर्षक प्राइज। लगातार खेलिए और पाएं लकी ड्रॉ में बंपर प्राइज सुजुकी ग्रैंड विटारा जीतने के मौके। क्विज अभी खेलने के लिए यहां क्लिक करें – https://dainik.bhaskar.com/opKQbplkiYb ————————– ये खबर भी पढ़ें… यूपी में मायावती के साथ आ सकते हैं ओवैसी, बिहार में जीते बसपा विधायक ने AIMIM का पोस्टर लगाया बिहार में एनडीए की प्रचंड जीत के बीच भी बसपा खाता खोलने में सफल रही। चुनाव जीतने के बाद पिंटू यादव मीडिया से बात कर रहे थे। उनके पीछे दो तस्वीर लगी थीं। पहली बसपा की और दूसरी AIMIM की। इस तस्वीर ने चर्चा तेज कर दी है कि क्या यूपी में बसपा-AIMIM साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में है? पढ़ें पूरी खबर