अभिव्यक्ति सोसाइटी ने मोहन राकेश के नाटक का मंचन किया:’आषाढ़ का एक दिन’ संगीत नाटक अकादमी में प्रस्तुत

अभिव्यक्ति कल्चरल एंड वेल्फेयर सोसाइटी ने मंगलवार को संगीत नाटक अकादमी स्थित संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह में प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का भावपूर्ण मंचन किया। यह आयोजन समाज को भारतीय संस्कृति और साहित्य से जोड़ने के संस्था के उद्देश्य के तहत किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत 7 नवंबर को दिवंगत हुए वरिष्ठ नाट्य लेखक पद्मश्री डी.पी. सिन्हा को श्रद्धांजलि देकर हुई। संस्था के अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि उनकी संस्था स्वस्थ साहित्य और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।मुख्य अतिथि प्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने नाटक के महत्व के बारे में बताया।उन्होंने कहा कि 1958 में लिखा गया मोहन राकेश का यह नाटक हिंदी नाट्य-साहित्य में आधुनिक चेतना का प्रतीक है। राजकवि बनने के बाद भी कालिदास अपने अंतर्मन के द्वंद्व से जूझते हैं नाटक की कहानी कवि कालिदास और उनकी प्रेयसी मल्लिका के इर्द-गिर्द घूमती है। हिमालय की वादियों में पनपा उनका प्रेम उज्जयिनी की राजनीति, राजदरबार की महत्वाकांक्षाओं और सामाजिक दबावों के कारण प्रभावित होता है। उज्जयिनी में राजकवि बनने के बाद भी कालिदास अपने अंतर्मन के द्वंद्व से जूझते रहते हैं। मंच-सज्जा नाटक की मूल भावना के अनुरूप आकर्षक थी। हिमालयी घाटी के एक छोटे से गाँव की कुटीर, वृक्षों से घिरा दृश्य और मध्यमवर्गीय परिवेश जीवंत प्रतीत हुआ। सरबजीत सिंह और करमजीत कौर द्वारा डिज़ाइन की गई वेशभूषा ने दर्शकों को नाटक के युग से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गोपाल सिन्हा की प्रकाश परिकल्पना ने बिजली की कड़क, बादलों के दृश्यों और समग्र वातावरण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। अविजित पाण्डेय और शुभम दुबे द्वारा तैयार पार्श्व संगीत ने नाटक के भावनात्मक माहौल को और गहरा किया। कार्यक्रम के अंत में संस्था के उपाध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने दर्शकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह मंचन लखनऊ के कला प्रेमियों, हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।