प्रतिष्ठा द्वादशी देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आजादी का दिवस है। सभी रामलला के चरणों में नतमस्तक हैं, इससे अधिक आजादी क्या चाहिए| यह ऐसे नहीं मिला। इसके लिए विवादित भवन को गिरा कर टाट में रहना पड़ा। अब अगर सोए तो पुनः समस्त मंदिर चले जाएंगे। इसके लिए जागृत होना होगा| इसको स्थिर करने के लिए, गतिमान करने के लिए वर्तमान परंपरा और पीढ़ी के लोगों को जागृत होना होगा। यह बात जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य ने कही। वे रामलला की प्रतिष्ठा द्वादशी समारोह में बधवार को प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बालक राम की कथा आगे विस्तार दिया। कहा कि ज्ञान की पराकाष्ठा लिए काग भुशुन्डिऔर देवाधिदेव महादेव अयोध्या की गलियों में महीनों घूमते रहे। अधर्म बढ़ता है तब भगवान मानव रूप में देह धारण करते उन्होंने कहा कहा वे बालक राम के दर्शन चाहते थे। संत प्रवर ने “बंदउं बाल रूप सोइ रामू… चौपाई के माध्यम से बालक राम की वंदना की और बताया, कि निर्गुण औऱ सगुण में उतना ही भेद है जितना बर्फ औऱ पानी में है। जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य ने आगे कहा कि सगुण बालक राम के पास हाथ, पैर सब है। जब अधर्म बढ़ता है तब भगवान मानव रूप में देह धारण करते हैं औऱ सज्जनों की पीड़ा का हरण करते है। जग में नारायण कहाँ नहीं है यह पूछो। केवल भजन करते रहें औऱ साधु की संगति नहीं हुई तो अहंकार हो जाता है। भजन में साधु कृपा औऱ भगवत कृपा दो बातों का ध्यान रखना होता है “जो करते रहोगे भजन धीरे-धीरे, तो मिल जाएगा वो सजन धीरे-धीरे” गीत पर श्रोता झूम उठे। भजन में साधु कृपा औऱ भगवत कृपा दो बातों का ध्यान रखना होता है। असुर प्रवृत्ति का लक्षण बताते हुए कहा जो माता पिता व देवता को नहीं मानता, साधुओं सज्जनों से अपनी सेवा कराते है, ऐसे लोग मनुष्य देह में भी असुर हैं। जिसने अपने मन का मंथन कर भक्ति रूपी नवनीत में परिवर्तित कर लिया वह पुनः सांसारिक बंधनों में नहीं बंध सकता। रामजन्म तक की कथा सुनाई उन्होंने कहा कि इसके साथ ही अयोध्या में राम जन्म के पूर्व ही अधिकांश देवी देवताओं के विभिन्न स्वरूपों में आने की कथा की व्याख्या की और रामजन्म तक की कथा सुनाई। साथ ही श्री राम जन्मोत्सव भी मनाया गया, कापियां, चाकलेट, खिलौने आदि लुटाए और बांटे गए।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य के व्यास गद्दी पर आसीन होने पर ट्रस्टी डॉ अनिल मिश्र, धनंजय पाठक, टिन्नू, डॉ चंद्रगोपाल पाण्डेय, आदि ने पूजन किया।