1658 में औरंगजेब के गद्दी संभालते ही हिंसा और अत्याचार का दौर शुरू हो गया। कई भव्य मंदिर धूल में बदल गए। ब्रजभूमि जहां राधाकृष्ण की लीलाएं गूंजती थीं, वो अब सन्नाटे में डूबी थी। वृंदावन की गलियों में सिहरन थी। यही वो समय था, जब ठाकुरजी के सेवकों ने श्रद्धा और साहस के साथ ऐसे फैसले लिए जो आने वाले सालों में भक्ति की ऐतिहासिक गाथा बन गए। पांचवें एपिसोड में आज पढ़िए, कैसे औरंगजेब के आदेश के बाद वृंदावन के सबसे ऊंचे मदनमोहन मंदिर को तोप से उड़ा दिया गया। जब मूर्ति यानी विग्रह तोड़ने के लिए सिपाही गए तो उन्हें गर्भगृह खाली मिला, क्योंकि सेवायत रात के अंधरे में विग्रह लेकर गायब हो चुके थे। ठाकुरजी वृंदावन से निकलकर आमेर (जयपुर) पहुंचे, लेकिन 250 किलोमीटर की दूरी तय करने में 68 साल लग गए। जानिए क्यों लगा इतना समय… 1669 की एक गर्म दोपहर थी। दिल्ली के लालकिले की दीवारों पर चिलचिलाती धूप थी। मुगल दरबार में सन्नाटा था। दरबारियों की आंखों में बेचैनी और खौफ था। तभी कदमों आहट सुनाई दी, दरबान ने मुनादी की-
“बा-अदब, बा-मुलाहिजा, होशियार… शहंशाह-ए-हिंद, बादशाह मुहीउद्दीन मोहम्मद औरंगजेब… दीवान-ए-खास में जलवा अफरोज हो रहे हैं…” औरंगजेब की आंखों में कठोरता और चेहरे पर कट्टरता साफ झलक रही थी। उसने तख्त पर बैठते ही कड़क आवाज में कहा- “अब वक्त आ गया है, जब इस मुल्क में ईमान कायम होगा। नाच-गाना बंद होगा। बुतखाने तोड़ दिए जाएंगे। काफिरों पर जजिया लगाया जाएगा।” दरबार में कुछ देर तक सन्नाटा रहा। फिर एक सूबेदार ने धीरे से पूछा- “हुजूर, फिर उन बड़े-बड़े मंदिरों का क्या किया जाए जो बादशाह अकबर के वक्त में बनवाए गए थे?”
औरंगजेब की नजरें ठंडी, लेकिन तेज थीं। “ढहा दो…। एक भी मंदिर न बचे…।” इस एक शाही फरमान ने हिंदोस्तान की फिजाओं में डर भर दिया। सैकड़ों सालों से भक्ति और संगीत से गूंजते मंदिर अब खामोश होने वाले थे। वृंदावन में चिंता की छाया वृंदावन के पवित्र घाटों पर उस शाम गंगा-जमुनी हवा बह रही थी। हरिनाम कीर्तन के धीमे स्वर सुनाई दे रहे थे। मदनमोहन मंदिर के गोस्वामी सुबलदास मंदिर परिसर में टहल रहे थे। “गोसाईं जी…” एक युवा सेवायत दौड़ता हुआ आया। उसका चेहरा पीला पड़ा था, सांसें फूल रही थीं। “गोसाईं जी, खबर आ गई है… दिल्ली से फरमान जारी हो चुका है। मुगल सिपाही जल्द ही यहां पहुंच सकते हैं।” सुबलदास की आंखें गहरी हो गईं। “तो फिर वक्त आ गया है…” उन्होंने धीमे से कहा। “क्या मतलब गोसाईं जी?” सेवक ने कांपती आवाज में पूछा। सुबलदास ने मंदिर के भीतर देखा। ठाकुर मदनमोहन जी का दिव्य विग्रह दीपक की लौ में चमक रहा था। “अब ठाकुरजी को यहां से निकालना होगा। अगर विग्रह यहां रहा तो वे लोग इसे नष्ट कर देंगे।” पास खड़ा एक बुजुर्ग भक्त बोला- “गोसाईं जी, लेकिन विग्रह लेकर जाएंगे कहां? रास्ते में मुगल सिपाही हैं। जगह-जगह पहरा है।” सुबलदास ने गहरी सांस ली। “हमें एक जगह का भरोसा है… आमेर।” लेकिन सुबलदास इतने आश्वस्त कैसे थे…? आमेर दरबार में गुप्त बैठक करीब ढाई साल पहले, 1666 के आसपास… गोस्वामी सुबलदास अचानक एक दिन आमेर पहुंचे। महल के अंदर मिर्जा राजा जय सिंह अपने दीवान के साथ बैठे थे। उन्होंने सुबलदास का स्वागत किया, लेकिन सुबलदास के चेहरे की गंभीरता ने उनके चेहरे पर भी चिंता की लकीरें खींच दीं। जय सिंह ने पूछा- “गोस्वामी जी, वृंदावन से अचानक आमेर आने का क्या कारण है?”
सुबलदास ने हाथ जोड़कर कहा- “महाराज, आपसे क्या छिपा है। म्लेच्छ बादशाह की वजह से भजन-पूजन करना दूभर हुआ जा रहा है। वृंदावन अब सुरक्षित नहीं रहा।” जय सिंह ने गंभीर आवाज में कहा- “हम जानते हैं… औरंगजेब हिंदुओं के लिए कितनी नफरत रखता है। आप चिंता मत कीजिए। मदनमोहन ठाकुरजी को आमेर ले आइए। ये धरती उनकी है और उनकी रक्षा हमारा धर्म।” सुबलदास बोले,- “लेकिन महाराज, रास्ता लंबा है। हर जगह सिपाही हैं। बिना आज्ञा पत्र कोई गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकेगी।” जय सिंह ने गहरी मुस्कुराहट के साथ बोले- “वो सब हम पर छोड़ दीजिए। आगरा और अजमेर के सूबेदारों से अनुमति पत्र दिलवाया जाएगा। यात्रा को तीर्थ यात्रा का रूप दिया जाएगा।” फिर उन्होंने ऊंची आवाज में अपने एक सैनिक अधिकारी को बुलाया। “तुरंत तैयारी करो। जब-तक ठाकुरजी आमेर नहीं पहुंचते, हमारी सांस चैन से नहीं चलेगी।” इस मुलाकात के कुछ ही महीनों बाद 1667 में मिर्जा राजा जय सिंह की मौत हो गई। इससे सुबलदास गोस्वामी को उस समय सूबेदारों का अनुमति पत्र होते हुए भी मदनमोहन जी को वृंदावन से बाहर ले जाना सुरक्षित नहीं लगा। अब 1669 में जब औरंगजेब का फरमान जारी होने के बाद उसी अनुमति पत्र का सहारा लेकर मदनमोहन जी को सुरक्षित निकालना था। पावन यात्रा की शुरुआत वृंदावन में एक ठंडी रात। मंदिर के प्रांगण में सिर्फ एक दीपक जल रहा था। हवा में हल्की ठंडक थी। मंदिर के पीछे बैलगाड़ियां खड़ी थीं। एक गाड़ी को विशेष रूप से मखमली कपड़ों और परदों से ढका गया था। उसी में मदनमोहन जी को विराजमान किया गया। सुबलदास ने गाड़ीवानों से धीरे से कहा- “याद रखना, कोई हल्ला-गुल्ला नहीं। अगर किसी ने पूछा तो कहना, तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं। ठाकुरजी हमारे हृदय में हैं और उनका आशीर्वाद हमारे साथ।”
गाड़ीवानों ने हाथ जोड़कर कहा- “जै श्री मदनमोहन!” तभी एक बुजुर्ग भक्त आगे बढ़ा और मदनमोहन जी के सामने घुटनों के बल बैठकर बोला- “ठाकुरजी… भले ही हम आपके साथ आमेर न जा रहे हों, पर हमारा मन आपके साथ जा रहा है।” सुबलदास की आंखें भर आईं। उन्होंने हाथ जोड़कर ठाकुरजी से प्रार्थना की और बैलगाड़ी आगे बढ़ाने का इशारा किया। मंदिर पर हमला कुछ दिनों बाद मुगल फौज वृंदावन पहुंची। एक ऊंची आवाज गूंजी- “तोप का मुंह मंदिर की ओर करो…” फौजदार घोड़े पर सवार था। उसका चेहरा गुस्से में लाल था। “मूर्ति उखाड़कर बाहर लाओ…” उसने चिल्लाकर कहा। एक सिपाही मंदिर की ओर दौड़ा। गर्भगृह खाली देखकर वहीं से चिल्लाता हुआ आया- “हुजूर, यहां कुछ नहीं है!”
“ये काफिर यहां से भी मूर्ति निकाल ले गए…” फौजदार ने गुस्से में तलवार घुमाई- “बुत नहीं तो इस बुतखाने का क्या काम… उड़ा दो इसे।” कुछ ही मिनटों में तोपें आग उगलने लगीं। मदनमोहन मंदिर का शिखर ढह गया। राख और धूल के बीच कुछ महिलाएं फूट-फूटकर रो रही थीं। एक भक्त मंदिर के बाहर पत्थरों पर कांपते हाथों से छूकर बोला- “उन्होंने ठाकुरजी को निकाल लिया… जय हो!” यात्रा की कठिन राह इस बीच जत्था वृंदावन से काफी दूर निकल चुका था। बैलगाड़ियां दिन में जंगलों में छिपतीं और रात को आगे बढ़तीं। रास्ता लंबा था। कुछ जगहों पर स्थानीय लोग बिना कुछ पूछे भोजन और पानी दे जाते। मानो उन्हें भी पता हो कि ये कोई साधारण यात्रा नहीं है। एक रात जंगल में जब सारी बैलगाड़ियां रुकीं, एक सेवायत घबराकर बोला- “गोस्वामी जी, पीछे कुछ सिपाहियों की हलचल लग रही है।”
सुबलदास शांत स्वर में बोले- “डरो मत। ठाकुरजी हमारे साथ हैं। उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।” इस तरह मदनमोहन जी राधाकुंड, भरतपुर, कुम्हेर, डीग होते हुए कामवन (कामां) पहुंचे। इनमें से कुछ पड़ावों पर ठाकुर जी कई साल विराजमान रहे तो कहीं कुछ महीने या कुछ दिन ही रुके। आमेर के लिए निकले मदनमोहन जी काफी सालों तक वहां नहीं पहुंचे। सूबेदारों का अनुमति पत्र साथ होने की वजह से खतरा कुछ कम था। 1707 में औरंगजेब की भी मौत हो गई। मुगल शासन धीरे-धीर कमजोर होता गया। इसके बाद साल 1737 में मदनमोहन जी आमेर की नई राजधानी जयपुर पहुंचे। जयपुर में दिव्य स्वागत और करौली नरेश की विनती 1737 की कार्तिक पूर्णिमा को ठाकुरजी जयपुर पधारे। उस दिन शहर की गलियों में उत्सव का माहौल था। ढोल-नगाड़ों की आवाज, हवा में उड़ते फूलों की पंखुड़ियां और हजारों भक्तों की भीड़।
सवाई राजा जय सिंह ने स्वयं मंदिर में पूजा-अर्चना की और बोले-
“आज जयपुर और आमेर रियासत धन्य हो गई। गोविंददेव जी के बाद मदनमोहन ठाकुर की कृपा हम पर हुई है। जब तक जयपुर रहेगा, ठाकुरजी का नाम गूंजता रहेगा।” जयपुर से करीब 200 किलोमीटर दूर करौली में राजा गोपाल सिंह काफी बेचैन थे। वे जादौन वंश के राजा थे। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म भी इसी राजवंश में हुआ था। राजा इस बात से परेशान थे कि भगवान कृष्ण के वंशज होते हुए भी उनकी रियासत में वृंदावन का कोई विग्रह नहीं है। करौली की राजकुमारी का विवाह जयपुर सवाई राजा जय सिंह से हुआ था। इस लिहाज से करौली और जयपुर में पारिवारिक रिश्ते थे। पांच साल तक गोपाल सिंह इस उलझन में फंसे रहे। आखिरकार 1742 में एक दिन सवाई राजा से मिलने जयपुर पहुंचे। राजदरबार में ही उन्होंने अपने मन की बात कही-
“महाराज, वृंदावन से आए दो ठाकुर जयपुर में विराजमान हैं। गोविंददेव जी जयपुर के राजा हैं। वहीं, मदनमोहन जी हमारे इष्ट हैं। आप कृपा करें, तो हमें उनकों करौली लाने का सौभाग्य मिल सकता है।” सवाई जय सिंह कुछ देर तक मौन रहे, फिर मुस्कुराकर और बोले- “गोपाल सिंह जी, ठाकुरजी तो सभी के हैं। आप भक्ति-भाव से उन्हें पुकार रहे हैं तो वे क्यों नहीं आएंगे आपके पास…।”
गोपाल सिंह भावुक होकर बोले- “महाराज, आज आपने हमें जीवन-धन दे दिया।” एक अन्य कथा के अनुसार मदनमोहन जी ने करौली के राजा गोपाल सिंह को सपने में दर्शन दिए और विग्रह को जयपुर से करौली ले आने की बात कही। राजा ने जब यह बात जयपुर के सवाई राजा जय सिंह को बताई तो राजा गोपाल सिंह की परीक्षा ली गई। सवाई राजा ने मदनमोहन जी से मिलते-जुलते कुछ और विग्रह बनवाकर एक साथ रखे गए। फिर गोपाल सिंह की आंखों पर पट्टी बांधकर मदनमोहन जी का असली विग्रह पहचानने को कहा गया। कहा जाता है तब मदनमोहन जी ने गोपाल सिंह की उंगली पकड़ ली। गोपाल सिंह ने पट्टी हटाई तो सामने वे मदनमोहन जी के असली विग्रह के सामने थे। इसके बाद सवाई राजा ने एक विग्रह करौली ले जाने की बात मान ली। करौली में भव्य स्वागत विक्रम संवत 1799 (1742 ई.) में फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जय सिंह ने पूजा-अर्चना के बाद मदनमोहन जी को पालकी में विराजमान किया। चारों ओर शंखनाद, नगाड़े और “जय श्री मदनमोहन” का जयघोष गूंज उठा। करीब ढाई महीने की यात्रा के बाद मदनमोहन जी करौली पहुंचे तो नगर में पहले से ही स्वागत की तैयारी थी। गलियों में आम के पत्तों से तोरण बांधे गए थे, घरों में दीपक जल रहे थे। महिलाएं मंगलगीत गा रही थीं। कई बुजुर्ग भक्तों की आंख में आंसू थे। एक बूढ़ी महिला बोली- “आज ठाकुरजी हमारे नगर में आ रहे हैं… कितने सौभाग्य की बात है!” मदनमोहन जी दो दिन तक अंजनी माता मंदिर और अगले दो दिन दीवान बाग के बंगले में विराजमान रहे। इसके बाद मदनमोहन जी को राजमहल में राधागोपाल मंदिर के एक हिस्से में प्रतिष्ठित किया गया। करीब पांच साल बाद विक्रम संवत 1805 (1748 ई) में माघ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को उसी मंदिर में राधागोपाल जी के स्थान पर मदनमोहन जी को विराजमान किया गया। मदनमोहन जी करौली के मेहमान थे और राधागोपाल जी मेजबान इसलिए उन्होंने अपना आसन छोड़कर मदनमोहन जी को विराजमान किया। पटोत्सव के दिन करौली में मानो स्वर्ग उतर आया था। शहनाइयों की आवाज, घोड़े-हाथियों की शोभायात्रा और भक्ति में डूबे भक्त। करौली के राजा गोपाल सिंह खुद मदनमोहन जी की पालकी अपने कंधों पर उठाए थे। गोपाल सिंह मन ही मन कह उठे- “जहां ठाकुरजी का वास होता है, वहीं सौभाग्य होता है। करौली अब साक्षात ठाकुरजी के चरणों में है।” कई बार इतिहास तलवारों और फरमानों से नहीं, भक्ति और साहस से लिखा जाता है। 1669 में औरंगजेब के फरमान को चुनौती देने वाली ये यात्राएं ब्रज से जयपुर, नाथद्वारा, करौली और देश के कई अन्य हिस्सों तक पहुंची। ये कृष्ण विग्रहों के ब्रज छोड़ने की नहीं, बल्कि उस आस्था की कहानी है, जो मुगलतख्त से बड़ी साबित हुई। उस प्रेम की कहानी है, जो हिंसा से ज्यादा ताकतवर साबित हुआ और उस भक्ति की कहानी है, जो अमर है। स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार **** रेफरेंस वेणु गोपाल शर्मा- करौली इतिहास के जानकार। गोस्वामी दीनबंधु दास, वृंदावन। किताब- श्री मदनमोहन महिमा प्रकाश। लक्ष्मी नारायण तिवारी, सचिव- ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृंदावन। ब्रज विभव: संपादक गोपाल प्रसाद व्यास। मथुरा-वृंदावन के वृहद हिंदू मंदिर: डॉ चंचल गोस्वामी। द कंट्रीब्यूशन ऑफ मेजर हिंदू टेंपल्स ऑफ मथुरा एंड वृंदावन: डॉ चंचल गोस्वामी। औरंगजेबनामा: संपादक डॉ अशोक कुमार सिंह। ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास: प्रभुदयाल मीतल। सनातन के संरक्षण में कछवाहों का योगदान: डॉ सुभाष शर्मा-जितेंद्र शेखावत। जयपुर इतिहास के जानकार- जितेंद्र शेखावत, संतोष शर्मा, प्रो देवेंद्र भगत (राजस्थान यूनिवर्सिटी)। मदनमोहन जी के वृंदावन से करौली पहुंचने तक की पूरी कहानी क्रमवार ढंग से किसी एक किताब में नहीं मिलती। भास्कर टीम ने कई दस्तावेजों और इतिहास के जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर यह स्टोरी लिखी है। फिर भी घटनाओं के क्रम में कुछ अंतर हो सकता है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।