रक्षा मंत्री की भतीजी का कार्डियक अरेस्ट से निधन:भाजपा नेता अनुपमा चंदेल को बेटी ने दी मुखाग्नि, अंतिम समय में भी नहीं पहुंचा कोई भाजपा नेता

बरेली में मंगलवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की भतीजी और विश्व हिंदू महासंघ भारत की प्रदेश मंत्री अनुपमा चंदेल मौर्य का निधन हो गया। अनुपमा (55) को सोमवार रात अचानक कार्डियक अरेस्ट आया था। इसके बाद उन्हें आनन-फानन में भोजीपुरा स्थित SRMS मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान मंगलवार सुबह 11 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। देर शाम संजय नगर स्थित श्मशान भूमि पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां उनकी 18 वर्षीय इकलौती बेटी राजश्री मौर्य ने नम आंखों से अपनी मां को मुखाग्नि दी। राजनीतिक सफर और पारिवारिक पृष्ठभूमि अनुपमा चंदेल मौर्य भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मौर्य की पत्नी थीं और खुद भी राजनीति में बेहद सक्रिय रही थीं। वह विधानसभा चुनाव भी लड़ चुकी थीं। उनके पति सुधीर मौर्य का कद कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी बड़ा था। वह राजनाथ सिंह की सरकार में दर्जा प्राप्त मंत्री रह चुके हैं और आंवला लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ चुके हैं। उस चुनाव में वह बेहद करीबी मुकाबले में महज 6000 वोटों से हार गए थे। यह परिवार लंबे समय से भाजपा की सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहा है। बीमारी और दुखद परिस्थितियां वर्तमान में यह परिवार बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। अनुपमा के पति सुधीर मौर्य पिछले 3 सालों से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और लंबे समय से अस्पताल में भर्ती हैं। वर्तमान में वह बरेली के प्रताप हॉस्पिटल में एडमिट हैं। सुधीर मौर्य की नाजुक हालत को देखते हुए परिजनों ने उन्हें यह दुखद जानकारी नहीं दी है कि उनकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं रहीं। घर के मुखिया के अस्पताल में होने और मां के चले जाने के बाद बेटी राजश्री पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। राजनीति की बेरुखी: अंतिम विदाई में नहीं पहुंचे दिग्गज इस दुखद घड़ी में राजनीति का एक निष्ठुर चेहरा भी सामने आया। एक समय था जब दर्जा मंत्री सुधीर मौर्य के घर पर सैकड़ों समर्थकों और भाजपा नेताओं का जमावड़ा लगा रहता था, लेकिन अनुपमा मौर्य के अंतिम संस्कार में कोई भी बड़ा भाजपा नेता नहीं पहुंचा। चर्चा रही कि जो नेता कभी सुधीर मौर्य के आगे-पीछे घूमते थे, उन्होंने पिछले 3 सालों से अस्पताल में भर्ती सुधीर का हाल तक नहीं जाना। रक्षा मंत्री की भतीजी और पार्टी की पदाधिकारी होने के बावजूद अंतिम विदाई में संगठन की यह बेरुखी चर्चा का विषय बनी रही।