नारी सशक्तिकरण और समानता की दृष्टि से वैदिक काल स्वर्ण युग था। वैदिक काल में नारी को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी, परंतु मध्यकाल में हालात बदल गए। पारिवारिक पाबंदियों की संवेदनशीलता और दहेज के विरुद्ध सामूहिक सुधार की आवश्यकता है। ये कहना है, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल की शिक्षक डॉ.अर्चना दुबे का। वो सोमवार को केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लखनऊ परिसर में दो दिवसीय उत्तर क्षेत्रीय राष्ट्रीय सम्मेलन समर्थ नारी समृद्ध भारत के दौरान अपनी बात रख रही थी। मां लेती है घर के अहम निर्णय इस दौरान लखनऊ परिसर के निदेशक प्रो.सर्व नारायण झा ने कहा कि शिक्षा मिलने के बाद नारी के भाव और रूप दोनों में बदलाव आ जाता है। घर में यदि मां के हाथ में कमान है तो परिवार के सभी सदस्यों का हित होता है। मां की बात बेटी और बहू दोनों मानेंगी तो सभी के लिए अच्छी सोच विकसित कर पाएंगी। ये भी रहे मौजूद कार्यक्रम में नारी से नारायणी तक के भारतीय दृष्टिकोण क्या है इस पर विचार विमर्श हुआ। प्रदर्शन कला के माध्यम से नारी की आत्म जागृति एवं समग्र सशक्तिकरण पर चर्चा हुई। जिसमें कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर शिवानी वी., लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.मनुका खन्ना, डॉ.कविता विसारिया, डॉ.संगीता गुंडिचा ने अपने विचार रखे। आर्थिक साक्षरता महिलाओं के लिए जरुरी कार्यक्रम में शोभा बाजपेयी ने भारतीय परंपरा में स्त्री को परामर्शदात्री बताते हुए कहा कि प्राचीन भारत में अरुंधति जैसी स्त्रियां पुरुष ऋषियों के समकक्ष स्थान रखती थीं। उन्होंने आर्थिक साक्षरता को आधुनिक महिलाओं के लिए अनिवार्य बताया। चिपको आंदोलन में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका को उदाहरण के रूप में रखा।