सीताराम विवाह की संध्या पर मंगलगीतों से गुंजायमान है अयोध्या:25 को 12 से अधिक मंदिरों में निकलेगी रामबारात, पूरी रात होगा लोकरीतियों से विवाह

अयोध्या नगरी इन दिनों अपूर्व आनंद और भक्तिभाव से सराबोर है।राम विवाह की पूर्व संध्या पर अयोध्या में विवाह के मंगल गीत गुंजायमान हैं।संत-महंत भगवान के नाम,रूप, लीला और धाम में मगन हैं। मिथिला से आई सखियां मंगल गीत गा रही है। कनक भवन, दशरथ महल, रंग महल, लक्ष्मण किला, जानकी महल ट्रस्ट, हनुमत निवास, मंत्रार्थ मंडपम,रामसखी मंदिर, गहाेई मंदिर और दिव्य कला कुंज से 25 नवंबर को शाम धूमधाम से रामबारात शाम को निकलेगी। बारातों के मंदिरों में वापस लौटने पर भगवान श्रीराम और सीता जी की मूर्तियों और स्वरूपों का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच लोक रीतियों से विवाह होगा।अलगे दिन 26 नवंबर को रामविवाह होगा। कनक भवन में तो यह उत्सव श्रीराम के गौना उत्सव तक चलता है। इस सबके बीच आचार्य पीठ लक्ष्मण किला में मिथिला से आई सखियों में युगल प्रिया आदि के मंगलगान गूंज रहे हैं।वे कहतीं हैं कि हम बचपन से अयोध्या आकर भगवान के विवाह का मंगलगीत गायन कर रहे हैं।यह मेरा सौभाग्य है।भगवान श्रीसीताराम के विवाह का पावन क्षण जैसे जैसे करीब आ रह मन आनंद से भर उठता है।इस परम सुख को प्राप्त कर लेना जीवन को धन्य बनाने जैसा है।यह महोत्सव लोक और परलोक दोनों को आनंदित करने वाला है। इस बीच दीपों की प्रभा, पुष्पों की सुगंध तथा मंगलगान की ध्वनियां वातावरण में ऐसे घुली हैं मानो त्रेता युग पुनः अवतरित हो उठा हो।अगहन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विवाह पंचमी के नाम से जाना जाता है।यह महोत्सव इस बार 25 नवंबर को पड़ रहा है। इस पावन पल पर जनकनंदिनी सीता और रघुनंदन श्रीराम के परम पावन विवाहोत्सव की स्मृतियां जब-जब सजीव होती हैं, अयोध्या के प्रत्येक मंदिर में श्रद्धा की तरंगें उमड़ पड़ती हैं। मंदिरों के प्रांगणों में वैदिक मंत्रों की अनुगूँज, भजन मंडलियों के सुवर्ण स्वर और भक्तों की आर्त प्रणति-सब मिलकर एक दिव्य रस रच रहे हैं। सुशोभित द्वार, केसर–चंदन से अलंकृत ध्वजारोहण, और फूलों से सजे मंडप अपने सौंदर्य से मानो उस ऐतिहासिक मंगल क्षण के साक्षी बन खड़े हों, जब धर्म, मर्यादा और प्रेम का संगम विवाह रूप में प्रकट हुआ था। भक्तजन आरती की लौ में प्रभु के सहज सौम्य मुख-कमल को निहारते हैं तो भाव-विभोर हो उठते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आज भी जनकपुर से आई देवियों का स्वागत हो रहा है, धनुषधारी प्रभु के चरणों में मंगल गीत गाए जा रहे हैं और संपूर्ण विश्व ‘सीताराम’ नाम की ध्वनि से पावन हो रहा है। अयोध्या का यह उल्लास केवल उत्सव नहीं—यह सनातन संस्कृति की उज्ज्वल घोषणा है कि धर्म और मर्यादा जहाँ एकत्र हों, वहाँ प्रेम सदैव विजयश्री प्राप्त करता है। श्रीराम विवाह के इस पावन पर्व पर पूरा नगर, प्रत्येक मंदिर और हर भक्त हृदय एक स्वर में यही कह उठता है-“सिय रघुवीर विवाह जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिनके सदा उछाह मंगलायतन राम जसु ॥ समूची अयोध्या में भगवान श्रीराम एवं माता सीता आदर्श दाम्पत्य के रूप में शिरोधार्य हैं। विवाहोत्सव के अवसर पर श्रीराम और सीता की विशेषता शिखर पर है। मंदिरों में श्रीराम के साथ सीता की अनिवार्य उपस्थिति के साथ विवाहोत्सव की बेला में इस दांपत्य के प्रति अर्पित अगाध प्रेम से भी यह सत्य पूरी गरिमा से छलक रहा है। इसका मर्म स्पष्ट करते हुए शीर्ष आध्यात्मिक विचारक एवं हनुमत निवास के महंत आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण श्रीराम के एक नाम ‘जानकी जीवन’ की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार इस नाम के दो निहितार्थ हैं। पहला यह कि जानकी के जीवन और दूसरा यह कि जानकी ही जिनकी जीवन हैं। गोस्वामी तुलसीदास और आदि कवि वाल्मीकि ने भी श्रीराम और सीता की गौरवमय अभिन्नता परिभाषित की है। रामचरितमानस में यह अभिन्नता इस तरह वर्णित है, गिरा अरथ जल बीचि सम/ कहिअत भिन्न न भिन्न। यानी भगवान राम एवं मां सीता उसी तरह परस्पर अभिन्न हैं, जैसे वाणी और उसका अर्थ तथा जल और जल की लहर कहने में तो अलग-अलग हैं, पर वास्तव में वे एक हैं। भगवान राम एवं सीता का अस्तित्व अनादि माना जाता है। शास्त्रों में यदि भगवान राम चराचर के नियंता, परात्पर ब्रह्म और अखंड ब्रह्मांड नायक के तौर पर वर्णित हैं, तो मां सीता सृष्टि की अधिष्ठात्री के तौर पर पूजित-प्रतिष्ठित हैं। रामचरितमानस के वंदना प्रसंग में मां सीता का परिचय प्रस्तुत करते हुए गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं- उद्भव स्थिति संहारकारिणीं क्लेश हारिणीम्, सर्व श्रेयस्करीं सीतां नतोहं रामवल्लभाम्।