भारतीय कला केवल रंगों और रेखाओं का खेल नहीं है, बल्कि यह हमारी सदियों पुरानी संस्कृति और आधुनिकता के बीच का एक मजबूत पुल है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) के इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स में चल रही दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शनिवार को संपन्न हो गई। इस सम्मेलन का मुख्य विषय “भारतीय कला की विविधता, निरंतरता और वैश्विक संवाद” रहा, जिसमें विशेषज्ञों ने बताया कि कैसे भारत की लोक कलाएं आज भी दुनिया भर में अपनी धाक जमाए हुए हैं। चित्रकूट के ‘राम दर्शन’ को बताया प्रेरणा का केंद्र समापन सत्र में देश के जाने-माने चित्रकार और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट के पूर्व विभागाध्यक्ष सुहास बहुलकर ने भारतीय कला की गहराई को समझाया। उन्होंने कलाकारों और छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि ‘चित्रकूट में राम दर्शन’ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि कला का एक जीवंत स्कूल है। हर कलाकार को वहां जाकर कला की बारीकियां समझनी चाहिए। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने खुद लाइव पेंटिंग का डेमो देकर छात्रों को दिखाया कि कैसे एक कोरा कैनवास भावनाओं को समेट लेता है। आधुनिकता के साथ चलनी चाहिए लोक कलाएं विशेषज्ञों ने चर्चा के दौरान इस बात पर जोर दिया कि भारतीय लोक कलाएं हमारे समाज के उल्लास और सांस्कृतिक चेतना का आइना हैं। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से आए डॉ. जयशंकर मिश्रा ने कहा कि,आधुनिकता के इस दौर में हमें अपनी पारंपरिक लोक कलाओं को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। इनका पुनरुद्धार तभी संभव है जब इन्हें आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़कर निरंतर आगे बढ़ाया जाए। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन तकनीक और परंपरा का संगम रहा। आयोजन सचिव डॉ. मंतोष यादव ने बताया कि दो दिनों के भीतर कुल 10 सत्र आयोजित किए गए। इसमें देश-विदेश के लगभग 170 संकाय सदस्यों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। खास बात यह रही कि प्रतिभागी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से जुड़े, जिससे कला पर एक व्यापक वैश्विक संवाद संभव हो सका। भविष्य के कलाकारों को मिला नया नजरिया इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स के निदेशक डॉ. मिठाई लाल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से संस्थान और छात्रों को कला के क्षेत्र में नई दिशा मिलती है। कार्यक्रम को सफल बनाने में विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों की टीम ने विशेष सहयोग दिया।