शहर के मैनावती मार्ग स्थित इस्कॉन मंदिर में मंगलवार को श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य उत्सव यानी गौर पूर्णिमा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। इस साल का उत्सव ऐतिहासिक रहा क्योंकि ठीक 540 साल बाद तिथि और नक्षत्रों का वैसा ही दुर्लभ संयोग बना, जैसा सन 1486 में महाप्रभु के जन्म के समय बना था। उस दौर में भी उनके प्राकट्य के समय चंद्र ग्रहण का काल था और मंगलवार को भी कानपुर में भक्तों ने ग्रहण काल के दौरान ही संकीर्तन करते हुए भगवान का स्वागत किया। चांदी के कलशों से महाअभिषेक और 56 भोग उत्सव की शुरुआत तड़के मंगल आरती और विशेष श्रृंगार के साथ हुई। शाम को चंद्र ग्रहण के समय मुख्य समारोह आयोजित किया गया, जिसमें श्री श्री निताई गौर सुंदर का चांदी के कलशों से भव्य महाअभिषेक संपन्न हुआ। दूध, दही, घी, शहद और पंचगव्य से हुए इस अभिषेक के बाद भक्तों ने भगवान को अपनी भक्ति से निर्मित स्वादिष्ट 56 भोग अर्पित किए। फूलों और विशेष आभूषणों से सजे महाप्रभु के दिव्य विग्रह के दर्शन पाने के लिए पूरा मंदिर परिसर भक्तों से खचाखच भरा रहा। भक्ति की तरंगों पर झूमे श्रद्धालु इस्कॉन कानपुर के अध्यक्ष प्रेमहरिनाम प्रभु ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि, चैतन्य महाप्रभु ने ही दुनिया को संकीर्तन आंदोलन की राह दिखाई और बताया कि कलयुग में हरि नाम से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। मंदिर प्रांगण को विशेष अलंकारों से सजाया गया था, जहाँ हरे कृष्ण महामंत्र की गूंज और वैष्णव गीतों की ध्वनि ने ऐसा माहौल बना दिया मानो साक्षात नवद्वीप धाम प्रकट हो गया हो। अभिषेक के बाद हुई विशेष गौर आरती में आध्यात्मिक रोमांच का अनुभव करते हुए सैकड़ों भक्त घंटों तक नृत्य करते रहे।