गुरु गोरखनाथ को चढ़ती है नेपाल नरेश की खिचड़ी:राजपरिवार से खिचड़ी आने की परंपरा कैसे शुरू हुई, जानिए

मकर संक्रांति के अवसर पर लाखों श्रद्धालु गोरखनाथ मंदिर में आस्था की खिचड़ी चढ़ाएंगे। सबसे पहले गोरक्षपीठाधीश्वर व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाएंगे। उसके बाद सीएम के हाथों ही नेपाल राज परिवार के यहां से आयी खिचड़ी चढ़ाई जाती है। यह परंपरा वर्षों पुरानी है। कई वर्षों से अनवरत नेपाल नरेश के यहां से खिचड़ी आती है। इस परंपरा का इतिहास नेपाल के एकीकरण से जुड़ा है।
इसी मान्यता के कारण ही हर वर्ष नेपाल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु खिचड़ी चढ़ाने के लिए गोरखनाथ मंदिर आते हैं। उनके आने का सिलसिला एक दिन पहले ही शुरू हो जाता है। मुख्यमंत्री के खिचड़ी चढ़ाने के बाद 15 जनवरी को ये श्रद्धालु खिचड़ी चढ़ाएंगे। नेपाल नरेश के यहां से खिचड़ी गोरखनाथ मंदिर लायी जा चुकी है। जानिए नेपाल राजपरिवार से खिचड़ी आने की परंपरा क्यों शुरू हुई गुरु गोरखनाथ को मकर संक्रांति पर नेपाल राज परिवार की ओर से खिचड़ी चढ़ाई जाती है। इसके पीछे का इतिहास नेपाल के एकीकरण से जुड़ा है। मान्यता है कि राजा के राजमहल के पास ही गुरु गोरक्षनाथ की गुफा थी। उस समय के राजा ने अपने बेटे राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह से कहा कि यदि कभी गुफा में जाएं तो वहां के योगी जो भी मांगे, उसे मना मत करें। जिज्ञासावश शाह खेलते हुए वहां पहुंच गए और गुरु ने उनसे दही मांगी। राजकुमार अपने माता-पिता के साथ दही लेकर जब गुरु के पास पहुंचे तो उन्होंने दही का आचमन कर युवराज के अंजुलि में उल्टी कर दी और उसे पीने को कहा। युवराज की अंजुलि से दही उनके पैरों पर गिर गई। लेकिन बालक को निर्दोष मानकर नेपाल के एकीकरण का वरदान गुरु ने दे दिया। बाद में इसी राजकुमार ने नेपाल का एकीकरण किया। तभी से नेपाल नरेश व वहां के लोगों के लिए गुरु गोरखनाथ आराध्य देव हैं। राजपरिवार से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा भी तभी से शुरू हुई जो आज तक चली आ रही है। अब जानिए कैसे शुरू हुई खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा
मान्यता है कि त्रेता युग में गुरु गोरक्षनाथ भिक्षा मांगते हुए हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के मशहूर ज्वाला देवी मंदिर गए। सिद्ध योगी को देख देवी साक्षात प्रकट हो गईं और गुरु को भोजन का आमंत्रण दिया। जब गुरु पहुंचे तो वहां मौजूद तरह-तरह के व्यंजन देख ग्रहण करने से इन्कार कर दिया और भिक्षा में मिले चावल-दाल ही ग्रहण करने की बात कही। देवी ने गुरु की इच्छा का सम्मान किया और कहा कि आप के द्वारा लाए गए चावल-दाल से ही भोजन कराऊंगी। उधर उन्होंने उसे बनाने के लिए पात्र में पानी आग पर चढ़ा दिया। वहां से गुरु भिक्षा मांगते हुए गोरखपुर चले आए। यहां उन्होंने राप्ती व रोहिन नदी के संगम पर एक स्थान का चयन कर अपना अक्षय पात्र रख दिया और साधना में लीन हो गए। उसी दौरान मकर संक्रांति पर लोगों ने एक योगी का भिक्षा पात्र देखा तो उसमें चावल-दाल डालने लगे। जब काफी मात्र में अन्न डालने के बाद भी पात्र नहीं भरा तो लोगों ने इसे योगी का चमत्कार माना और उनके सामने श्रद्धा से सिर झुकाने लगे। तभी से गुरु के इस तपस्थली पर मकर संक्रांति पर चावल-दाल चढ़ाने की जो परंपरा शुरु हुई। यह परंपरा आज तक उसी आस्था व श्रद्धा के साथ चल रही है।