गोरखपुर में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने कहा कि ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन केंद्र और राज्य सरकारों के साथ कॉरपोरेट कंपनियों के बीच बिचौलिये की भूमिका निभा रही है। समिति के अनुसार दिल्ली में हो रहा इस एसोसिएशन का वार्षिक महाधिवेशन ऊर्जा मंत्रियों की बैठक से पहले निजीकरण निर्णय के लिए लॉबिइंग का मंच बना हुआ है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) ने सभी राज्य सरकारों से 22–23 जनवरी को ऊर्जा मंत्रियों की होने वाली बैठक में विद्युत (संशोधन) बिल और बिजली निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ सख़्त और समन्वित रुख अपनाने की अपील की है। फेडरेशन का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन ऊर्जा क्षेत्र के सार्वजनिक ढांचे और उपभोक्ता हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। बैठक का एजेंडा और समयरेखा स्पष्ट
22–23 जनवरी को होने वाली राज्यों के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर करेंगे, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल और डिस्कॉम निजीकरण प्रमुख विषय होंगे। फेडरेशन ने कहा कि इस बैठक में राज्यों की एकजुटता ऊर्जा क्षेत्र की संरचना और संघीय अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण होगी। फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को भेजे पत्र में कहा कि प्रस्तावित बिल राज्यों के वितरण निगमों (DISCOMs) की वित्तीय सेहत, संघीय ढांचे, उपभोक्ता सुरक्षा और सार्वजनिक बिजली तंत्र के लिए गंभीर खतरा है। पत्र की प्रति सभी ऊर्जा मंत्रियों को भी भेजी गई है। वित्तीय संरचना पर प्रभाव का आकलन
फेडरेशन का तर्क है कि बिल निजी कंपनियों को बिना निवेश सार्वजनिक धन से बने नेटवर्क का उपयोग करने की अनुमति देता है और इन्हें केवल लाभदायक औद्योगिक एवं वाणिज्यिक उपभोक्ताओं का चयन करने की छूट मिल जाएगी। इससे राज्य वितरण कंपनियां घाटे वाले ग्रामीण तथा घरेलू उपभोक्ताओं का बोझ उठाने को बाध्य होंगी, जिससे वित्तीय संकट गहरा सकता है। फेडरेशन ने कहा कि अनिवार्य ओपन एक्सेस, सार्वभौमिक आपूर्ति दायित्व समाप्त करने और क्रॉस-सब्सिडी खत्म करने जैसे प्रावधानों के चलते किसानों, घरेलू उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों पर 30–50% तक बिजली दर वृद्धि का खतरा बढ़ जाएगा। ऐसे प्रावधान ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। संघीय ढांचे और ग्रिड स्थिरता पर सवाल
फेडरेशन ने सट्टा आधारित बिजली बाजार, समानांतर इलेक्ट्रिक लाइन अथॉरिटी तथा केंद्रीकृत नीति निकाय की अवधारणाओं को बिजली ग्रिड की स्थिरता, राज्य अधिकारों और संघीय संरचना के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है। फेडरेशन का कहना है कि इससे राज्यों की नीति निर्माण और नियमन क्षमता कमजोर हो सकती है। फेडरेशन ने कहा कि बिजली वितरण क्षेत्र में प्रस्तावित बदलाव ‘बैकडोर प्राइवेटाइजेशन’ का तरीका है, जिसमें सार्वजनिक धन से खड़ी की गई संपत्तियां निजी कंपनियों को सौंप दी जाएंगी, परंतु निवेश, रखरखाव और सार्वभौमिक सेवा की जिम्मेदारी राज्यों पर ही रहेगी। इससे बिजली महंगी होने और कृषि व छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका जताई गई। राज्यों से सख़्त विरोध की मांग
पत्र में राज्यों से प्रस्तावित बिल, डिस्कॉम निजीकरण और साझा नेटवर्क अवधारणा को खारिज करने तथा बिजली जैसे समवर्ती सूची विषय पर अपने अधिकार सुरक्षित रखने की मांग की गई है। फेडरेशन ने कहा कि बिजली सार्वजनिक सेवा है और इसे सस्ता व सुलभ रखना सरकारों की जिम्मेदारी है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, गोरखपुर के संयोजक इं. पुष्पेंद्र सिंह ने कहा कि बिजली निजीकरण कृषि, घरेलू उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालेगा, इसलिए राज्यों को आगामी बैठक में स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाना चाहिए।