बेटा कभी पलक झपकाएगा, तभी हर बात बताती थी:गाजियाबाद में मां का दर्द- हम बूढ़े हो चले, SC ने पहली बार इच्छामृत्यु दी

गाजियाबाद के राज एंपायर सोसाइटी की 13वीं मंजिल। साधारण से फ्लैट के कमरे में मेडिकल बेड पर हरीश (31) बेसुध लेटा है। पेट में पैग सेट पाइप और नाक में ऑक्सीजन पाइप लगा है। घर में परिजन, जानने वाले, अनजान, सरकारी अधिकारी व मीडियावालों का तांता लगा है। पिता अशोक राणा भरे गले से बता रहे हैं कि हमारी साढ़े बारह साल की सेवाओं का हिसाब-किताब अब पूरा हो रहा है, इसलिए यह फैसला आ गया। पिता बोले- हम जानते हैं उसे, आखिरी बार बिस्तर से क्यों उठा रहे हैं… उसे भगवान की गोद में छोड़ रहे हैं। हरीश की मां ने एक दिन कहा कि अब तो हम भी बूढ़े हो रहे हैं, इसकी देखभाल कौन करेगा? राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से गुहार लगानी चाहिए। ब्रह्मकुमारी परिवार से जुड़ा राणा परिवार ब्रह्मकुमारी परिवार से जुड़े राणा परिवार ने अपना दर्द दीदी से साझा किया तो उन्होंने एक वकील भेजा। राणा कहते हैं, ‘हाईकोर्ट ने तो हमारी याचिका खारिज ही कर दी थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देकर हरीश पर बड़ा उपकार किया। हमसे उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती, बेबसी ये है कि वह बता भी नहीं पाता कि उसे कहां-क्या तकलीफ है। हमारा तो बच्चा है, सेवा कर रहे हैं और जब तक सामर्थ्य है करते ही रहेंगे। कोर्ट के फैसले के बाद एम्स ने सभी तैयारी कर ली है। बस हमें तय करना है कि उसे आखिरी बार इस बिस्तर से उठाकर कब एम्स ले चलें। हम तो इसे पैसिव यूथेनेशिया भी नहीं बोलना चाहते। हम इसे भगवान की गोद में छोड़ रहे है। हम उसे ऐसे अनुभवी डॉक्टरों के पास छोड़ रहे हैं जो उसे घातक इंजेक्शन नहीं देंगे। बल्कि प्राकृतिक रूप से जीवन छोड़ने का रास्ता सुगम करेंगे। एम्स में अनुभवी डॉक्टरों की निगरानी में सिर्फ फूड पाइप हटाएंगे। हम उसे पानी पिलाते रहेंगे, जैसे कोई व्रत करता है। जब हरीश प्राण त्याग देगा तो बहुत सम्मान से घर लाएंगे और उसे अंतिम विदाई देंगे। कौन मां-बाप अपने बच्चे को इस स्थिति में ले जाना चाहेगा मां चुप हैं, एकदम भावशून्य चेहरा, न खुशी कि बच्चे को मुक्ति मिल रही है और न गम कि आखिरी घड़ी आ पहुंची। हालांकि, कुछ बोलते ही फफक पड़ती हैं… कौन मां-बाप अपने बच्चे को इस स्थिति में ले जाना चाहेगा। जिसे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया। फिर से अबोध की तरह उसकी देखभाल करनी पड़ी तो उसमें मां को कष्ट कैसा। दुख तो बस इस बात का रहा कि इसने तो अपनी पीड़ा भी नहीं बताई। सुबह-शाम जब उसकी मालिश करती तो मैं उसे घर के किस्से सुनाती आज क्या-क्या हुआ? कई बार घंटों तक बस इंतजार करती कि एक बार बस पलक झपके ताकि मुझे लगे कि उसने सब सुन लिया। कभी उबासी लेता, कभी छींक आती या आंखों के आसपास की त्वचा फड़कती तो हमें उसी से उसके जिंदा होने का सुकून होता था। 2013 में रक्षाबंधन के दिन चंडीगढ़ में उसके चार मंजिल से गिरने की खबर मिली थी। रात को ही हम पहुंचे तो इसे अचेत पाया। पहले 10 दिन वहीं पीजीआई में रहा, फिर एम्स दिल्ली में एक महीने वेंटिलेटर पर रहा। अगले कुछ महीने कभी अपोलो, कभी मेदांता और कई अस्पतालों में रहा। डॉक्टरों ने बताया कि वह लाइलाज स्थिति में पहुंच गया, सिर्फ दुआ और सेवा ही बची है। हम घर ले आए। अब पढ़िए इच्छामृत्यु के लिए दूसरी संघर्ष की कहानियां 1. कर्नाटकः 30 साल से गरिमापूर्ण मृत्यु की जंग लड़ रही हैं कैंसर पीड़ित करिबासम्मा कनार्टक के दावनगरे की 86 वर्षीय पूर्व शिक्षिका एचबी करिबासम्मा 3 दशकों से गरिमापूर्ण मृत्यु के हक के लिए संघर्षरत हैं। 1996 में स्लिप डिस्क की असहनीय पीड़ा के बाद उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमिला नेसरगी के सहयोग से 1998 में उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुद्दे पर कानूनी मोड़ दिया। कैंसर से जूझ रही करिबासम्मा आश्रय ओल्ड एज होम में रहती हैं। 2025 में कर्नाटक सरकार ने पैसिव यूथनेशिया पर सर्कुलर जारी किया, लेकिन स्पष्ट गाइडलाइंस नहीं है। उनकी मांग है कि सरकारी अस्पतालों में विशेष वार्ड और पारदर्शी प्रक्रिया तय हो ताकि करीब मरीजों को राहत मिले। करिबासम्मा का मानना है कि सम्मानजनक मौत न केवल मरीज, बल्कि उसकी सेवा करने वालों की गरिमा के लिए भी जरूरी है। 2. मध्य प्रदेशः 5 साल से डॉक्टर बेटा कोमा में, माता-पिता कर रहे सेवा, 20 लाख उधार हुआ मध्य प्रदेश के बड़वानी के होम्योपैथिक डॉक्टर हरीश गोले पिछले 5 वर्षों से कोमा में हैं। 2 मार्च 2021 को क्लिनिक जाते समय सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ में गंभीर चोटें आई। लंबा इलाज और सर्जरी के बाद भी वे होश में नहीं आ सके। तब से 46 वर्षीय हरीश घर के बिस्तर पर हैं। उनके बुजुर्ग पिता सोहनलाल और मां बीना बाई ही उनकी देखभाल कर रहे हैं। ट्यूब के जरिए दूध, जूस और दवाएं दी जाती हैं। पिता रोज उन्हें करवट दिलाते हैं, मालिश करते हैं और शरीर की सफाई करते हैं। इलाज और घर के खर्च ने परिवार को आर्थिक संकट में डाल दिया है। करीब 20 लाख रु. उधार हो चुके हैं। 3. महाराष्ट्रः ब्रेन डेड श्रेया का चेहरा 4 साल से ऐसे ही, पिता को उम्मीद अब भी ठीक हो जाएगी बेटी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की 28 वर्षीय श्रेया सॉफ्टवेयर डेवलपर बनने का सपना देखती थीं। श्रेया ने पुणे के डीवाई पाटील कॉलेज से एमसीए किया और फाइनल में टॉप किया था। 3 फरवरी 2022 की रात घर लौटते समय हुई दुर्घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी। उनके मस्तिष्क को चोट लगी। डॉक्टरों के अनुसार यह सामान्य स्थिति में लौट पाएंगी या नहीं, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। पिछले 4
वर्षों से श्रेया बिस्तर पर हैं। 2022 में खेन डेड घोषित किया था। उनका चेहरा हमेशा ऐसा ही रहता है। माता-पिता को उम्मीद है कि बेटी अब भी ठीक हो सकती है इसलिए उनहोंने इच्छा मृत्यु की मांग नहीं की। 4. केरलः दुर्लभ बीमारी से जूझते 2 बच्चों के परिवार का दर्द
केरल के कोट्टायम जिले के स्मिता एंटनी और मनु जोसेफ संकट से जूझ रहे हैं। उनके 2 बच्चों को सॉल्ट-वेस्टिंग कंजेनिटल एड्रिनल हाइपरप्लासिया नाम की गंभीर बीमारी है, जिसमें लगातार दवाएं और निगरानी जरूरी होती है। एक बच्चे में गंभीर ऑटिज्म भी है, जिससे देखभाल और कठिन हो गई। बच्चों की सेवा के लिए दोनों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। आमदनी बंद हो गई और इलाज का खर्च बढ़ता गया। परिवार ने संपत्ति बेची, घर गिरवी रखा और उधार लिया। 2024 में इस दंपती ने सुप्रीम कोर्ट से पूरे परिवार के लिए मसीं किलिंग की अनुमति मांगने की बात कही। फिर प्रशासन सक्रिय हुआ और कुछ आर्थिक मदद भी मिली। ——————-
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सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी,13 साल से कोमा में बेटा, माता-पिता ने लगाई थी गुहार सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। पढ़िए पूरी खबर