IPS कल्पना सक्सेना…यूपी पुलिस फोर्स का वो नाम, जिसने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। जहां रहीं, कानून-व्यवस्था चाक-चौबंद बनाए रखी। सहारनपुर में आतंकियों की रीढ़ तोड़ी। कल्पना सक्सेना, मतलब नो करप्शन। भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में बरेली की एसपी रहते हुए उन्हें जान से मारने की कोशिश की गई। 3 सिपाहियों ने उन्हें गाड़ी से कुचलने का प्रयास किया। 2010 के इस मामले में 15 साल बाद फैसला आया। तीनों सिपाहियों को दोषी मानते हुए 10-10 साल की सजा सुनाई गई। इस केस के चलते कल्पना सक्सेना सुर्खियों में हैं। वेस्ट यूपी की कल्पना सक्सेना प्रोफेसर रही हैं। लेकिन, खाकी वर्दी उनका ड्रीम थी। यही वजह है कि उन्होंने अपने कदम बढ़ाए और मंजिल हासिल की। यह सफर कैसा रहा? कल्पना सक्सेना की लाइफ कैसी रही? वो कौन-सा केस है, जो उन्हें आज भी याद है… दैनिक भास्कर की स्पेशल सीरीज खाकी वर्दी में आज जानते हैं IPS कल्पना सक्सेना की कहानी… मेरठ में 21 अप्रैल 1968 को जन्मी कल्पना सक्सेना गाजियाबाद में बतौर एडिशनल पुलिस कमिश्नर तैनात हैं। वह बताती हैं- शहर में एक जगह है, सूरजकुंड। यहां मेरा घर है। पापा प्रमोद कुमार सक्सेना और मम्मी सुमन लता सक्सेना, दोनों डिफेंस में अकाउंटेंट अफसर रहे हैं। मेरी प्राइमरी एजुकेशन शहर के ही सेंट थॉमस स्कूल से हुई। वहां से मैंने 1982 में हाईस्कूल किया। इसके बाद आरजी गर्ल्स इंटर कॉलेज से फर्स्ट डिवीजन के साथ 12वीं किया। जब 12वीं में थी, तभी मैंने अपना टारगेट सेट किया था कि मुझे IPS अफसर बनना है। इसके लिए मैंने तैयारी भी शुरू कर दी थी। मम्मी-पापा भी चाहते थे कि बेटी पुलिस अफसर बने। कल्पना सक्सेना बताती हैं- 1986 में आरजीपीजी कॉलेज से मैंने ग्रेजुएशन किया। फिर मेरठ कॉलेज से ज्योग्राफी में एमए किया। पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद मैंने सिविल सर्विस की तैयारी में पूरा जोर लगा दिया। मैं दिल्ली चली गई। वहां JNU से एमफिल किया। 1991-93… 2 साल तक एक कॉलेज में प्रोफेसर रही। लेकिन, मुझे अपना ड्रीम पूरा करना था। इसलिए जैसे ही UPPCS का फॉर्म आया, मैंने इसे भर दिया। पहले ही प्रयास में मेरा PPS में सिलेक्शन हो गया, बैच 1994 था। कल्पना सक्सेना बताती हैं- ट्रेनिंग के बाद मेरी पहली तैनाती बतौर सीओ सहारनपुर में हुई। उस समय उत्तराखंड राज्य नहीं बना था। सहारनपुर माफियाओं का गढ़ रहा है। यहां रेत का अवैध खनन होता था। वहीं गंगोह और नकुड़ ऐसे क्षेत्र थे, जहां सबसे ज्यादा संदिग्ध एक्टिविटी होती थी। मुझे याद है कि इस एरिया में पुलिसिंग बड़ी चुनौती मानी जाती थी। यहां तो इंटेलिजेंस की टीम भी अपनी नजर रखती थी। जब मैं यहां पहुंची, तो हमारे पास लगातार इनपुट आने लगे कि बार्डर पास से संदिग्ध लोग यहां रेकी करने आते हैं। इनका रूट पंजाब होता था। हमने टीम बनाकर पूरे जिले में संदिग्ध लोगों को सर्च करने के लिए बड़े स्तर पर ऑपरेशन किया। इसमें उस समय एक आतंकी पनाह लिए था, सबसे पहले उसे पकड़ा गया। उससे पूछताछ में पता चला कि वह गोपनीय जानकारी इकट्ठा कर रहा था। एक बड़ी घटना को अंजाम देने की साजिश चल रही थी। इस आतंकी को पकड़ने के बाद हमने तत्काल सीनियर अफसर को सूचना भेजी। फिर इस आतंकी के जरिए सुरक्षा एजेंसी ने अपना काम किया। सहारनपुर में पंजाब से शराब की स्मगलिंग भी होती थी। अवैध-मिलावटी शराब की खेप लगातार जिले में लाई जाती। हमने इस पर भी एक्शन लिया। एक साल में 20 से ज्यादा शराब माफिया पकड़े गए। कल्पना सक्सेना बताती हैं- 2010 की बात है। मेरा प्रमोशन हुआ। मैं अब पीपीएस से आईपीएस बन गई। इसके बाद मेरी पहली पोस्टिंग बतौर SP ट्रैफिक बरेली में हुई। इससे पहले बरेली में SP ट्रैफिक का पद स्वतंत्र नहीं था। शासन के आदेश पर मुझे यहां भेजा गया और स्वतंत्र प्रभार मिला। लखनऊ-दिल्ली हाईवे के बीच में बरेली से ट्रकों का सबसे अधिक आवागमन होता है। यहां से उत्तराखंड के लिए भी ट्रक और दूसरे मालवाहक वाहन जाते हैं। तैनाती के बाद मुझे लगातार शिकायत मिलने लगी कि ट्रैफिक पुलिस में लूटमार मची है। कुछ सिपाही हर एक ट्रक से वसूली करते हैं। यह पता चलते ही मैंने ठान लिया कि हर हाल में इस वसूली को रोकना है। उस समय जिले में SSP/ DIG की जिम्मेदारी होती थी। आईजी सर ने भी कई बार निर्देशित करते हुए कहा- जो शिकायतें मिल रही हैं, उन पर सख्त एक्शन लिया जाए। कल्पना सक्सेना आगे बताती हैं- 2 सितंबर 2010 का दिन था। इस दिन को मैं कभी नहीं भूल सकती। मुझे सूचना मिली कि दिल्ली-लखनऊ हाईवे पर जाम लगा है। मैं फौरन अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंची और जाम खुलवाने लगी। इसके बाद अपनी गाड़ी से कैंट के मेन रोड पहुंच गई। यहां आकर रुकी ही थी कि मेरे पास टेलीफोन से फिर एक सूचना आई। सामने वाले ने कहा- कल्पना मैडम बोल रही हैं। मैंने कहा- जी हां। इसके बाद उसने जल्दबाजी में बताया- यहां कैंट रोड के आगे कच्ची सड़क पर कुछ सिपाही अवैध वसूली कर रहे हैं। ट्रकों से पैसे ले रहे हैं और उन्हें एंट्री करवा रहे हैं। यह सूचना मिलते ही मैं बताई गई लोकेशन पर पहुंच गई। यहां जाकर देखा कि वर्दी पहने 3 सिपाही पुलिस जीप में बैठे थे। एक सादे कपड़े में गाड़ी के बाहर खड़ा था। मैंने इन्हें देखते ही कहा- क्या हो रहा है? मेरे साथ दो गनर थे। लेकिन, इन लोगों को अवैध वसूली करते देख मेरा खून खौल उठा। मैं इनके पास तक चली गई। जैसे ही पास पहुंची…इन लोगों ने अपनी जीप स्टार्ट कर दी। मनोज नाम का सिपाही ड्राइवर गाड़ी चला रहा था। ये लोग मेरी तरफ तेजी से बढ़े। इन लोगों ने जान से मारने की नीयत से मेरे ऊपर गाड़ी चढ़ा दी। मैं जोर से बोली- यह क्या कर रहे हो? मैंने साइड में हटने की कोशिश की, लेकिन गाड़ी का एक पहिया मेरे पैर पर चढ़ गया। मैं चिल्लाई, तो सिपाही बोले- छोड़ना मत, मार डालो, वरना…। इसी बीच मैं गाड़ी के एंगल में फंस गई थी। करीब 300 मीटर तक मैं घिसटती हुई गई। फिर अंदर बैठे एक सिपाही ने मुझे जोर से धक्का दिया, जिसके बाद मैं गिर गई। मैं बुरी तरह जख्मी हो गई थी। कल्पना बताती हैं- मेरे गनर दौड़कर आए और मुझे लेकर अस्पताल पहुंचे। मुझे नहीं पता कि मैं कैसे बच गई? मेरे सिर-हाथ, पैर और घुटने में चोट लगी थी। इसकी सूचना डीआईजी और अन्य अधिकारियों को वायरलेस से दी गई। इसके बाद कैंट थाने में चारों सिपाहियों मनोज, रविंद्र इसके भाई धमेंद्र और चौथे सिपाही के खिलाफ केस दर्ज किया गया। इनमें दो सिपाही रविंद्र और धर्मेंद्र के पिता मेघनाथ हिस्ट्रीशीटर थे। उसे फर्रुखाबाद पुलिस ने 1982 में एनकाउंटर में मार गिराया था। ये सिपाही पुलिस के लुटेरे नहीं, बल्कि डकैत भी थे। जांच में सबकी कुंडली सामने आ गई। इन चारों को जेल भेजा गया। 2010 के मुकदमे के बाद इनका कोई समन भी नहीं हुआ। 2023 में पहली बार सीनियर ऑफिसर ने पुरानी फाइलों का संज्ञान लिया। अब लगा कि मुझे इंसाफ मिलेगा और यही हुआ। कोर्ट ने दोषियों को 10-10 साल की सजा सुनाई। मुझे उम्मीद थी कि एक-न-एक दिन मुझे इंसाफ मिलेगा। कल्पना सक्सेना बताती हैं- जून, 2013 की बात है, मैं एसपी क्राइम मुजफ्फरनगर थी। उस समय यहां मर्डर की घटनाएं ज्यादा होती थीं। आधी रात का समय था। अलीपुर-अटेरना रोड पर एक युवक के मर्डर की सूचना मिली। रात में मौके पर पहुंचकर क्राइम सीन देखा गया। मरने वाले युवक की पहचान मारूफ के रूप में हुई। पहले लगा कि यह लूट के लिए तो हत्या नहीं? फोरेंसिक एक्सपर्ट भी मौके पर बुलाए। क्राइम सीन देखकर अंदाजा हो गया था कि तमंचे से सटाकर गोली मारी गई है। इसी के आधार पर इस केस को सॉल्व करने के साक्ष्य जुटाए। मरने वाले मारूफ के परिजनों से भी पुलिस ने घटना की जानकारी की। लेकिन, वे लोग भी किसी रंजिश से इनकार करने लगे। इसके बाद मरने वाले युवक के मोबाइल की कॉल डिटेल खंगाली गई। इसमें पुलिस को एक नंबर संदिग्ध मिला। यहां से पुलिस को कुछ अहम जानकारियां मिलीं। मुजफ्फरनगर के रसूलपुर दभेड़ी का रहने वाले मारूफ की मेरठ की एक युवती से बात होती थी। इस युवती के भाई जान मोहम्म्द को पता चल गया था कि उसकी बहन के मारूफ से अवैध संबंध हैं। इसके बाद पुलिस ने आरोपी जान मोहम्मद की लोकेशन ट्रेस की तो पता चला कि मर्डर वाली रात वह अपने घर मेरठ में नहीं था। पुलिस ने जान मोहम्मद को हिरासत में लेकर पूछताछ की। पहले तो वह लगातार गुमराह करता रहा। बाद में उसकी बहन के बारे में पूछा तो आरोपी ने अपने दोस्तों के साथ मर्डर की पूरी कहानी कबूल की। यह ऑनर किलिंग से जुड़ा मामला था। कल्पना सक्सेना बताती हैं- 2015 में मैं एसपी सिटी बिजनौर के पद पर तैनात थी। शाम होते ही देहात क्षेत्र में लगातार लूट की घटनाएं होने लगीं। इसमें पहले कई थाना प्रभारियों को कड़े निर्देश दिए कि पुलिस अलर्ट नहीं है। अलग-अलग दिनों में जो लूट की घटनाएं हुई, उनमें एक बात सामने आई कि बाइक पर पीछे बैठी महिला ही लूट करती है। वह दुल्हन की तरह सजी हुई कपड़ों में देखी गई। उसके बाद लगा कि यह गैंग प्रोफेशनल है। फिर ऐसे ही केस मेरठ और मुजफ्फरनगर से भी सामने आए। पता चला, 2 महीने पहले बुलंदशहर में भी लूट की कई वारदात इसी तरह से हुई हैं। यह गैंग महिलाओं के कुंडल, मंगलसूत्र और सोने की चेन को ही निशाना बनाता था। फिर जिन महिलाओं के रात में जेवर लूटे गए उनसे बातचीत की गई। पता चला, गैंग में नई-नवेली दुल्हन ही बाइक पर पीछे बैठकर लूट करती थी। एक लूट करने के बाद उस क्षेत्र को छोड़कर दूसरे जिले में जाकर छिप जाती है। इस गैंग को पकड़ने के लिए पूरा फोकस किया। बिजनौर में कोतवाली से कोटद्वार रोड पर एक विवाहिता, जो अपने पति के साथ जा रही थी, उससे चेन और कुंडल लूट लिए गए। सूचना पर पुलिस ने घेराबंदी कर बदमाशों को पकड़ने का जाल बिछाया। इसमें पुलिस ने लुटेरी दुल्हन पुष्पा और उसके प्रेमी हरपाल को अरेस्ट कर लिया। दोनों से लूटे हुए जेवरात भी बरामद कर लिए। 30 साल की इस लुटेरी दुल्हन ने बताया कि वह पिछले एक साल से गैंग चला रही है। दुल्हन बनती है, इसलिए पुलिस वाले रोकते नहीं। इस गैंग की रीढ़ तोड़ते हुए पुलिस ने सातों बदमाशों को अरेस्ट किया। इस गैंग ने बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में 50 से ज्यादा लूट की वारदात को अंजाम दिया था। बाइक पर बैठकर जाते हुए ही लुटेरी दुल्हन पुष्पा चंद सेकेंड में चेन और कुंडल झपट लेती थी। कल्पना सक्सेना सख्त पुलिस अफसरों में एक हैं। क्राइम केस सॉल्व करने में इनकी अलग ही पहचान है। इसलिए वेस्ट यूपी में उनकी तैनाती ज्यादा रही है। वह सहारनपुर, मुजफ्फरनगर में बतौर सीओ तैनात रहीं। एसपी सिटी सहारनपुर, मेरठ पीएसी में डिप्टी कमांडेंट, एसपी ट्रैफिक बरेली, एसपी क्राइम व SPRA मुजफ्फरनगर, एसपी सिटी बिजनौर, एसपी इंटेलिजेंस मुरादाबाद रह चुकी हैं। नोएडा और गाजियाबाद में पीएसी में कमांडेंट रही हैं। एसपी पीटीएस मुरादाबाद से फिर यहीं डीआईजी बनीं। कल्पना सक्सेना की पोस्टिंग सबसे अधिक मुजफ्फरनगर में रही। 2013 में हुए दंगों के समय लॉ एंड ऑर्डर संभालने के लिए भी शासन ने उन्हें यहां भेजा। इसके बाद शहर और देहात में माहौल संभाला। उन्हें दंगों की जांच की जिम्मेदारी भी मिली। एडिशनल एसपी रहते हुए उन्हें दंगों की जांच के लिए विशेष जांच प्रकोष्ठ का प्रभारी बनाया। उन्होंने 106 मुकदमों की टीम के साथ जांच की। इनमें हत्या, आगजनी और जानलेवा हमले के मुकदमे थे। साक्ष्य के आधार पर आरोपियों को अरेस्ट कर जेल भेजा। पीटीएस में एसपी/डीआईजी रहते हुए 1000 महिला दरोगा का प्रशिक्षण पूरा कराया। वह अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करते हुए कहती हैं कि परिवार की मर्जी से शादी की। हसबैंड आलोक श्रीवास्तव देहरादून में प्रोफेसर हैं। अचीवमेंट्स ————————————————- खाकी वर्दी सीरीज की यह स्टोरी भी पढ़ें 48 लाख का पैकेज छोड़ IPS बनीं अंजलि विश्वकर्मा, इंस्टा पर बिल्डिंग देख लड़की का रेस्क्यू किया, 12 साल पुराने दोस्त से की लव मैरिज IPS अंजलि विश्वकर्मा…UP पुलिस फोर्स की तेज तर्रार युवा अफसर हैं। 4 साल के करियर में अंजलि विश्वकर्मा ने कई बड़े केस सॉल्व कर दिए। महिला क्राइम के खिलाफ ऑपरेशन चलाया। झांसी में रहते हुए एक लड़की के सफल रेस्क्यू के बाद वह सुर्खियों में आईं। पढ़ें पूरी स्टोरी…