यूपी के योद्धा-4:घायल होने के बावजूद मोर्चे पर लौटे, दुश्मन से 2 गांव छीने; आगरा के कैप्टन सोढ़ी की कहानी

3 दिसंबर, 1971 की रात ने देश को जंग के मुहाने पर ला खड़ा किया था। पाकिस्तान ने भारत के कई एयरफोर्स बेस पर हमला करके जंग की शुरुआत कर दी थी। दुनियाभर के रेडियो और अखबारों के लिए ये सुर्खियां थीं, लेकिन सीमा पर तैनात जवानों के लिए सामने खड़ी सच्चाई। आगरा के रहने वाले कैप्टन रणवीर सिंह सोढ़ी पंजाब के फाजिल्का सेक्टर में तैनात थे। सिर्फ 24 साल की उम्र में आर्मी की तोपखाना रेजिमेंट में कैप्टन के तौर पर अहम जिम्मेदारी निभा रहे थे। मोर्चे पर तैनात जवानों को आगे बढ़ने के लिए पीछे से आर्टिलरी सपोर्ट देना काफी पेचीदा काम था। पाकिस्तानी फौज ने अपनी आदत के मुताबिक इस बार भी छल किया था। बॉर्डर के दोनों तरफ बसे गांवों में कुछ खेत सीमा के बिल्कुल नजदीक थे। आर्मी की निगरानी में किसानों को खेती की इजाजत थी। इसी की आड़ में दुश्मन ने चाल चली। बेरीवाला ब्रिज सीमा के बेहद करीब था। वहां से आवाजाही आम बात थी। शाम का वक्त था। इलाके पर नजर रख रहे जवानों को सामान्य-सी आवाजाही पर कुछ शक हुआ। एक जवान ने अपने सीनियर से कहा- “साब, वो बैलगाड़ी कुछ अजीब लग रही है। इतने में दूसरा जवान पास आया और दूरबीन से देखकर बोला- “साब, ये लोग अपनी तरफ के गांववाले नहीं लग रहे।” सीनियर अफसर ने दूरबीन से देखा। फिर गंभीर आवाज में बोला- “वायरलेस से सेक्टर को अलर्ट भेजो तुरंत…।” इतना कहकर अफसर फिर से दूरबीन में देखने लगा। इस बार और भी गंभीर आवाज में बोला- “ये किसान नहीं लग रहे। कोई भी आपस में बात नहीं कर रहा। कुछ सिर झुकाकर बैठे हैं और कुछ के चेहरे आधे ढके हुए।” अफसर ने कड़क आवाज में आदेश दिया- “सभी लोग हथियार तैयार रखो।” तभी एक जवान बोला- “साब, ये लोग बेरीवाला ब्रिज की तरफ मुड़ रहे हैं।” अफसर की आवाज भारी हो गई- “मेरा शक सही निकला, लेकिन हम देर कर चुके हैं।” कुछ ही मिनटों में हलचल तेज हो गई। एक सिपाही चिल्लाया- “साब, उन्होंने हथियार निकल लिए हैं और बेरीवाला ब्रिज पर कब्जा कर लिया।” कमांड पोस्ट में सन्नाटा था। ब्रिज से फाजिल्का टाउन महज 5-6 किलोमीटर दूर था। दूरी कम थी और खतरा बहुत बड़ा। दुश्मन यहां से आगे बढ़कर टाउन कब्जाने की फिराक में था। ऐसा होते ही अबोहर, श्री मुक्तसर साहिब, फिरोजपुर, श्रीगंगानगर जैसे अहम इलाकों का पूरा रोड नेटवर्क खुल जाता। सबको अंदाजा था कि ये सिर्फ एक ब्रिज की नहीं, पूरे इलाके की सिक्योरिटी का सवाल है। बिना देर किए आसपास का पूरा इलाका सील करने का आदेश दिया गया। दुश्मन करीब 7 किलोमीटर भारत की सीमा में घुस आया था। उसे पीछे धकेलने के लिए 3 दिसंबर की उसी शाम काउंटर अटैक शुरू हो गया। पीछे तोपखाना टुकड़ी में कैप्टन रणवीर सिंह सोढ़ी तक मैसेज पहुंचा। उन्होंने फ्रंटफुट पर जवानों को सपोर्ट देने के लिए आर्टिलरी खोलने का आदेश दिया। पहले गोले के साथ सन्नाटा टूटा। फिर एक के बाद एक धमाकों से पूरा इलाका गूंज उठा। कैप्टन सोढ़ी ने जवानों का हौसला बढ़ाया- “अब पीछे देखने का वक्त नहीं है।” एक जवान ने कहा- “जीत हमारी होगी साब, दुश्मन टैंक लेकर आगे नहीं बढ़ सकता। नीचे नहर है और ब्रिज टैंक का वजन झेलने लायक नहीं है।” कैप्टन सोढ़ी ने हां में सिर हिलाया। फिर बोले- “हां, लेकिन हर लोकेशन पर नजर गड़ाए रखनी है। कुल 45 लोकेशन पर हमारे साथी मोर्चा संभाले हैं। हमें किसी भी लोकेशन पर कमजोर नहीं होना है।” वक्त के साथ-साथ रात का अंधेरा गहराता जा रहा था। एक पल को यूं लगा जैसे रात सब कुछ निगल लेगी, लेकिन फिर अचानक तोप दहाड़ने लगी। रोशनी चमकी, आसमान फटा-सा लगा। एक जवान ने कहा- “दुश्मन की पूरी फ्रंट लाइन टारगेट पर है।” कैप्टन सोढ़ी ने जवाब दिया- “ध्यान मत हटने देना। आज रात हर सेकेंड हमारी जिम्मेदारी है।” उधर, बेरीवाला ब्रिज पर हमारे जवान मोर्चा संभाले थे। लग रहा था कि हम सही दिशा में जा रहे हैं। तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। किसी ने चिल्लाकर कहा- “साब…! टैंक पर हिट हुआ है…।” कमांडिंग ऑफिसर ने पीछे देखा, दुश्मन का इन-गन ग्रेनेड सीधे एक टैंक पर गिरा था। टैंक बर्बाद हो चुका था और उसी पल काउंटर अटैक रुक गया। कंपनी ‘पक्का’ नाम के इलाके में तैनात थी। हालात लगातार बिगड़ रहे थे। तभी कंपनी को पीछे हटने का आदेश दिया गया। ये बहुत बड़ा धक्का था। खासकर तब, जब दुश्मन आंखों के ठीक सामने हो। फिर भी ऑर्डर तो मानना ही था। कंपनी पीछे हटने लगी। एक जवान ने दबी आवाज में कहा- “साब, दुश्मन एकदम सामने है। वो भी हमारा मूवमेंट देख रहा होगा। पीछे हटना भारी पड़ेगा।” ऑफिसर ने सख्ती से कहा- “ऑर्डर आया है तो किसी स्ट्रैटजी के तहत आया होगा। बिना सवाल किए पीछे हटना है।” जवान धीरे-धीरे पीछे हटने लगे। कुछ देर बाद एक सुरक्षित ठिकाने पर सभी ने अपनी-अपनी पोजिशन ले ली। इसी दौरान हमारे कुछ जवानों को दुश्मन फौज ने पकड़ लिया। फ्रंट मोर्चे से काफी पीछे कैप्टन सोढ़ी आर्टिलरी अटैक दोबारा शुरू करने के ऑर्डर का इंतजार कर रहे थे। तभी सिग्नलमैन ने हेडफोन उतारते हुए कहा- “साब… रेडियो सेट पर कुछ अजीब हो रहा है।” कैप्टन ने हेडफोन पहना। आवाज आई- “अब बोलो… क्या ऑर्डर है?” सिग्नलमैन, कैप्टन सोढ़ी की तरफ देख रहा था। कैप्टन ने धीमी आवाज में कहा- “ये हमारे साथियों की आवाज नहीं है। लगता है हमारा रेडियो सेट दुश्मन के साथ लग गया है।” पाकिस्तानी फौज के चंगुल में फंसे जवानों के पास रेडियो सेट भी था। वही दुश्मन के हाथ लग चुका था। ये रणनीतिक तौर पर बहुत खतरनाक था। दरअसल, फ्रंट मोर्चे से आए ऑर्डर और उनकी बताई पोजिशन के हिसाब से ही कैप्टन सोढ़ी की यूनिट पीछे से गोले दागती थी। पोजिशनिंग और फायरिंग ऑर्डर रेडियो से दिए जाते थे। अब ये जानकारी दुश्मन भी सुन रहा था। हमारे टारगेट की जानकारी भी उन तक पहुंच रही थी। दुश्मन हमारी फ्रीक्वेंसी को डिस्टर्ब करने लगा था। कम्युनिकेशन लाइन के बीच आकर भ्रम पैदा करनी की कोशिश कर रहा था। रेडियो पर आवाज आई- “अब बताओ, किस तरफ फायर करोगे?” एक जवान ने गुस्से में कहा- “साब, ये ब#%3द तो हमारी लाइन जाम कर रहे हैं।” कैप्टन सोढ़ी जो ऑर्डर दे रहे थे, वो उनकी टीम तक साफ-साफ नहीं पहुंच पा रहा था। मतलब साफ था कि अगर एक भी ऑर्डर गलत पहुंचा तो अपने ही जवानों पर गोले गिर सकते थे। कैप्टन सोढ़ी कुछ सोचते हुए बोले- “घबराने की जरूरत नहीं है। कोई लोकल तरीका निकालना पड़ेगा।” कुछ देर चुप होकर सोचते रहे, फिर बोले- “अब से हम सीधे शब्दों में नहीं बोलेंगे। लेफ्ट, राइट, आगे ये सब बंद…। कोड में बात होगी। ऐसे शब्दों में, जो सिर्फ हमें समझ आएं।” कैप्टन सोढ़ी ने गांव की बोली के कुछ शब्द ऑर्डर लेने और बाकी बातचीत के लिए तय कर दिए। पूरी यूनिट उन्हीं कोड वर्ड्स के जरिए मैसेज भेजने लगी। दुश्मन हमारे रेडियो सेट की फ्रीक्वेंसी में आता और कुछ समझ न आने पर गालियां देने लगता। थोड़ा डिस्टरबेंस होता, लेकिन इंस्ट्रक्शन जवानों तक पहुंच जाता। उधर, कंपनी के पीछे हटने का नतीजा ये हुआ कि दुश्मन बेरीवाला ब्रिज पार करके ‘गुरुमुखखेड़ा’ गांव में घुस चुका था। गांव पर दोबारा कब्जा करने की जिम्मेदारी जाट रेजिमेंट को दी गई। कैप्टन सोढ़ी ‘आर्टिलरी गन ऑपरेशन लीड’ के तौर पर जाट रेजिमेंट के सपोर्ट में आगे बढ़ रहे थे। दोनों तरफ से लगातार गोला-बारूद दागे जा रहे थे। कड़ी लड़ाई के बाद गांव अपने कब्जे में आ गया था, लेकिन हमें काफी नुकसान पहुंचा था। हमारे काफी जवान शहीद हुए थे। बहुत से घायल थे, फिर भी दुश्मन को पीछे धकेलने का जज्बा कायम था। भारतीय फौज धीरे-धीरे ब्रिज के नजदीक पहुंच रही थी। वहां मौजूद हमारे कई बंकरों पर दुश्मन का कब्जा था। जवानों ने अंग्रेजी के ‘यू’ (U) अक्षर की तरह लेफ्ट-राइट और फ्रंट से अटैक किया। एक-एक करके कई बंकर दोबारा हमारे हाथ आ गए। फिर भी 8-10 बंकर ऐसे थे, जिन पर दुश्मन मजबूती से जमा था। उधर से भीषण फायरिंग हो रही थी। पाकिस्तान की एक पूरी ब्रिगेड (करीब 5 हजार सैनिक) उन्हें बैकिंग दे रहे थे। एक और चुनौती ये थी कि दुश्मन ने पहले से ही स्नाइपर्स तैनात कर रखे थे। जवानों के सिर उठाते ही गोलियों की बौछार होने लगती। पोजिशन बदलने की कोशिश भी कई बार जानलेवा साबित हुई। कई बहादुर सिपाही ‘स्नाइपर फायर’ में शहीद हो गए। गुरुमुखखेड़ा गांव से बेरीवाला ब्रिज तक की ये लड़ाई अपनी जमीन वापस पाने की नहीं, बल्कि धैर्य, रणनीति और बलिदान की परीक्षा थी। 8-9 दिसंबर, 1971 की रात गहरा अंधेरा था। चारों ओर अजीब-सी खामोशी पसरी थी। कैप्टन सोढ़ी एक बंकर में थे। सुबह होने से ठीक पहले उनके कानों में एक जानी-पहचानी आवाज पड़ी। उन्होंने ध्यान से सुना। ये टैंकों की आवाज थी। कैप्टन बंकर के मुहाने पर आए। एक जवान दूरबीन से कुछ देख रहा था। कैप्टन सोढ़ी जवान से दूरबीन मांगकर देखने लगे। जवान ने कहा- “ब्रिज के उस पार कुछ हलचल हो रही है, साब।” कैप्टन ने देखते ही कहा- “उस पास के गांव में टैंक मूवमेंट है।” फिर सिग्नलमैन की तरफ देखकर बोले- “फ्रंटलाइन से पूछो, क्या जानकारी है। सिग्नलमैन ने फ्रंट मोर्चे पर मैसेज करके जानकारी ली। फिर बोला- “दुश्मन ने गांव में बेस बना लिया है, साब।” इतना सुनते ही कैप्टन सोढ़ी ने ऑर्डर दिया- “मीडियम आर्टिलरी तैयार करो। गांव पर भारी फायर दागो, तुरंत…।” कुछ ही देर में तोप के गोलों की आवाज से आसमान गूंज उठा। दनादन बरसते गोलों से दुश्मन को भारी नुकसान हुआ। उनकी पोजिशन हिलने लगी। लेकिन, उसी दौरान एक पल में सब बदल गया। दुश्मन के किसी जवान को कैप्टन सोढ़ी के बंकर की लोकेशन पता चल गई। अगले ही पल दूसरी तरफ से डायरेक्ट फायरिंग शुरू हो गई। कुछ देर बाद एक जोरदार धमाका हुआ। दुश्मन का एक गोला सीधे बंकर पर आ गिरा। पूरा बंकर ढह चुका था। कैप्टन रणवीर सिंह सोढ़ी और टेक्निकल असिस्टेंट ज्ञान सिंह बुरी तरह घायल थे। दोनों का शरीर खून से लथपथ था। बंकर के अंदर धुआं, मिट्टी और दर्द सब एक साथ मिल गए थे। कुछ देर बाद आवाज सुनाई दी- “आंखें खोलिए कैप्टन साब… आंखें खोलिए।” कुछ साथी जवान उन्हें बचाने आ गए थे। कैप्टन सोढ़ी कराहते हुए बोले- “ज्ञान सिंह कहां है?” एक दर्द भरी आवाज आई- “यहीं हूं साब… बस सांस अटकी है।” कैप्टन सोढ़ी और ज्ञान सिंह को सुरक्षित जगह ले जाया गया। मेडिकल टीम ने दोनों को देखते ही कहा- “इन्हें फौरन अस्पताल भेजने की जरूरत है।” कैप्टन सोढ़ी ने कमजोर आवाज में जवाब दिया- “नहीं, पहले पोजिशन संभालो।” एक जवान ने हाथ जोड़कर कहा- “आपका इलाज जरूरी है साब, हम यहां मोर्चा नहीं छोड़ेंगे।” कैप्टन आंखें झपकाते हुए टूटती आवाज में बोले- “दुश्मन पीछे हटा या नहीं…?” जवान ने कहा- “फायर जारी है साब…।” तभी दूसरा जवान कैप्टन सोढ़ी के बिल्कुल पास आकर बोला- “आप चिंता न करें साब, भारत मां का हर लाल दुश्मन को पीछे धकेलकर ही दम लेगा।” कैप्टन सोढ़ी के जख्मी चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई। वे बोले- “बस यही भरोसा चाहिए।” थोड़ी देर बाद गोलियों और धमाकों की गूंज के बीच एंबुलेंस की दूर जाती आवाज सुनाई दी। अस्पताल में मरहम-पट्टी के बाद कैप्टन सोढ़ी को कुछ होश आया। तब तक रात हो चुकी थी। दूर से आती धमाकों की आवाज उनके कानों में पड़ रही थी। एक-एक पल उन्हें और ज्यादा बेचैन किए जा रहा था। अगले दिन डॉक्टर ने पट्टी बदलते हुए कहा- “कैप्टन, आपको आराम की जरूरत है।” सोढ़ी ने टीस भरी आवाज में जवाब दिया- “आराम तो बॉर्डर पर ही मिलेगा डॉक्टर साब, यहां नहीं…।” एक नर्स बोली- “आपको काफी ब्लीडिंग हुई है। शरीर कमजोर है आपका…” सोढ़ी ने धीमे, लेकिन सख्त लहजे में कहा- “वहां मेरे भाई लड़ रहे हैं और मैं यहां लेटा हूं।” उनकी आवाज में एक तड़प थी। डॉक्टर ने कहा- “अभी जाना खतरे से खाली नहीं है। आप पहले ठीक हो जाइए।” सोढ़ी ने फिर तर्क किया- “खतरा तो वहां है, जहां दुश्मन खड़ा है। और ठीक तो तभी होऊंगा जब वापस मोर्चे पर पहुंचूंगा।” डॉक्टर ने ज्यादा बहस करना ठीक नहीं समझा और पट्टी ठीक करके चला गया। कैप्टन रणवीर सिंह सोढ़ी अस्पताल में किसी तरह चार दिन गुजारने के बाद दोबारा मोर्चे पर लौट आए। शरीर पर जख्मों की टीस बाकी थी, लेकिन हौसला पहले से ज्यादा मजबूत था। उन्हें आदेश मिला- “दुश्मन के कब्जे में गए गट्टी गोलान गांव की पोस्ट 1 और 2 को फिर से हासिल करना है।” ये आसान मिशन नहीं था, लेकिन इस बार रुकने का सवाल ही नहीं था। कैप्टन सोढ़ी टैंकों के साथ आगे बढ़े। गोलियों की आवाज, तोपों की गड़गड़ाहट और बारूद की गंध के बीच उन्होंने मोर्चा संभाला। हर कदम पर खतरा था, लेकिन पीछे हटने का रास्ता नहीं था। कई टुकड़ियां एक साथ धीरे-धीरे गांव की सीमा में दाखिल हुईं। काफी गोलाबारी के बाद जब आखिरी चौकी खाली हुई, तो साफ हो गया कि लड़ाई जीत ली है। गट्टी गोलान का इलाका फिर से भारत के कब्जे में था और दुश्मन को पीछे हटना पड़ा। 16 दिसंबर 1972 की सुबह, कैप्टन सोढ़ी अपने बंकर में थे। एक जवान दौड़ता हुआ उनके पास पहुंचा। तनकर सैल्यूट करने के बाद बोला- “बड़ी खबर है साब…!” कैप्टन ने उसके चेहरे की तरफ देखा। ये ‘बड़ी खबर’ बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी। वो हल्का सा मुस्कुरा भी रहा था। कैप्टन सोढ़ी ने वजह पूछी। उत्साह से भरा वो जवान बोला- “ढाका में पाकिस्तानी ने सरेंडर कर दिया है साब…। पूर्वी पाकिस्तान अब आजाद है।” एक पल को सन्नाटा छा गया। फिर किसी ने पूछा- “सरेंडर… मतलब?” जवाब आया- “तिरानबे हजार पाकिस्तानी फौजियों ने भारतीय सेना के सामने हथियार डाल दिए हैं।” इतना सुनते ही बंकर के अंदर माहौल बदल गया। हर किसी की आंखें गर्व से चमक उठीं। किसी ने धीरे से कहा- “हम जीत गए सर…” कैप्टन सोढ़ी ने एक लंबी सांस भरते हुए कहा- “ये तो पहले से ही तय था।” फाजिल्का सेक्टर में ये खबर आग की तरह फैल गई। जवानों के चेहरे बता रहे थे कि वो पल जिंदगी भर याद रहेगा, लेकिन खतरा टला नहीं था। वो फील्ड एरिया में थे। जीत की खुशी भी संभलकर मनानी थी। कैप्टन सोढ़ी ने जवानों से कहा- “ध्यान रखो, जश्न बाद में। हमें 24 घंटे चौकसी रखनी है। जमीन, बंकर और पोजिशन कुछ भी कमजोर नहीं छोड़ी जा सकती था।” बेरीवाला ब्रिज पर लगातार निगरानी हो रही थी। दुश्मन वहां से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सका। कुछ दिन में हालात नॉर्मल हुए। गांववाले वापस आने लगे। लोग जवानों के लिए ट्रैक्टरों में भरकर खाने-पीने का सामान, फल-मिठाइयां वगैरह लेकर आ रहे थे। गांववाले कहते जा रहे थे- “साब, ये खुशियां आप लोगों की वजह से है। आपने हमारा घर-द्वार बचा लिया।” सीजफायर के बाद हालात पूरी तरह शांत हो गए। गोली-बंदूकों के धमाकों की जगह ढोल-ताशों की आवाज फिर गूंजने लगी थी। 1972 में कैप्टन रणवीर सिंह सोढ़ी को उनकी साहसिक लीडरशिप, दुश्मन के सामने डटे रहने और कठिन हालात में भी मोर्चा संभाले रखने के लिए ‘मेंशन इन डिस्पैचेस’ के सम्मान से नवाजा गया। ये सम्मान सिर्फ उनकी वीरता ही नहीं, बल्कि उस जज्बे की पहचान भी था, जिसने फाजिल्का सेक्टर और बेरीवाला ब्रिज जैसे रणनीतिक मोर्चों पर दुश्मन की हर कोशिश नाकाम कर दी। रणवीर सिंह सोढ़ी 31 अक्टूबर, 1997 को कर्नल की रैंक से रिटायर हुए। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार *** कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ——————————————————— सीरीज की ये स्टोरी भी पढ़ें… गोलीबारी के बीच ठहाके लगाते रहे, बोले- शेर शिकार नहीं छोड़ता; ‌वीर दृगपाल सिंह की कहानी भारतीय सेना जवाबी कार्रवाई की तैयारी कर ही रही थी कि दुश्मन का दबाव अचानक बहुत बढ़ गया। शुरुआती दौर में भारतीय टुकड़ियां इस तेज हमले को पूरी तरह रोक नहीं पाईं। पाकिस्तान ने जानबूझकर बॉर्डर के आसपास बसे गांवों को निशाना बनाया। पूरी स्टोरी पढ़ें…