यूपी के योद्धा-5:सिर्फ 4 सिपाहियों के साथ दुश्मन को रोका, वीर अतर सिंह का कहानी

‘यूपी के योद्धा’ में आज कहानी एक ऐसे जांबाज सपूत की है, जिसने 1967 की भारत-चीन जंग में गजब की बहादुरी दिखाई। दुश्मन के भीषण हमले में पोस्ट पर तैनात लगभग सभी जवान शहीद हो चुके थे या गंभीर रूप से घायल थे। ऐसे हालात में भी 24 साल के सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह ने हिम्मत नहीं हारी। सिर्फ चार जवानों के साथ मोर्चा संभाले रखा और दुश्मन को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसी अदम्य वीरता के लिए उन्हें स्पेशल प्रमोशन देकर कैप्टन बना दिया गया। 1971 में पाकिस्तान के साथ जंग में भी अतर सिंह की भूमिका बेहद अहम रही। जब भारतीय सेना दुश्मन के इलाके में 78 किलोमीटर अंदर तक पहुंच चुकी थी, तब रेगिस्तान के उस अनजान और खतरनाक इलाके में फौज तक रसद, पानी और गोला बारूद पहुंचाने की जिम्मेदारी उन्हीं को सौंपी गई। उनका साहस हर मोर्चे पर भी मिसाल बन गया। लेकिन पहले 1967 में चीन के साथ जंग की कहानी… 1962 की जंग के पांच साल बाद भी इंडो-चाइना बॉर्डर पर हालात नॉर्मल नहीं हो पाए थे। चीन की चौकियों और भारत की डिफेंस लाइन में सिर्फ 50 गज की दूरी थी। दुश्मन सामने था। उसकी आंखों में टकराव का इरादा साफ दिखता था। इसी माहौल में सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह को नाथू ला दर्रे के पास बॉर्डर पर पोस्टिंग मिली। ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के नए नवेले अफसर की ये पहली पोस्टिंग थी। 15 अगस्त, 1967 सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह, अपने कंपनी कमांडर कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर से सामने हाजिर था। कमांडर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। छह फीट लंबा, मजबूत कद-काठी वाला अफसर, उम्र करीब 24 साल। कैप्टन डागर ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे खुशी है कि एक ऐसा साथी मिला है, जो जरूरत पड़ने पर चीनियों के मुंह पर थप्पड़ जड़ सकता है।” अतर सिंह की पोस्टिंग को अभी पंद्रह दिन ही बीते थे। चीन ने अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया था। चीनी सैनिक बार-बार बॉर्डर क्रॉस कर रहे थे। भारत के जवान विरोध करते तो बदतमीजी पर उतर आते। खबर आर्मी हेडक्वार्टर पहुंची तो आदेश आया- “बॉर्डर पर तारबंदी कर दीजिए। उनकी आवाजाही बंद होनी चाहिए।” सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह ने तुरंत अपनी पलटन को इकट्ठा किया, बोले- “दुश्मन की आवाजाही रोकने के लिए बॉर्डर पर तारबंदी करनी है। तैयारी शुरू करो…।” अगली सुबह जवानों ने बिना शोर के अपना काम शुरू कर दिया, लेकिन जैसे ही चीनी सैनिकों की नजर पड़ी वो चिल्लाने लगे। भारतीय जवानों को रोकने की कोशिश की, धमकियां दीं। पहले तीखी बहस हुई। फिर गालियां और अगले ही पल हाथापाई शुरू हो गई। दोनों और से लात-घूसे चलने लगे। हालात बिगड़ते देख सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह आगे आए। छह फीट लंबा, मजबूत कद-काठी वाला वो अफसर चीनी सैनिकों को उठाकर दूर फेंकने लगा। उसके सामने चीनी सैनिक बौने नजर आ रहे थे। जैसे-तैसे मामला शांत हुआ, लेकिन दो दिन में करीब 8-9 बार दोनों सेनाओं के बीच इसी तरह से झड़प हुई। कैप्टन डागर ने हाई कमान को रिपोर्ट भेजी- “सर, चीनी सैनिक लगातार बदतमीजी कर रहे हैं। तारबंदी रोकने की कोशिश कर रहे हैं। कई बार झड़प हो चुकी है।” इस बार आदेश आया- “तारबंदी और मजबूत की जाए। तारों की संख्या बढ़ाई जाए।” कैप्टन डागर ने कहा- “इसके लिए हमें और जवानों की जरूरत होगी।” हाईकमान ने हालात की गंभीरता समझते हुए तुरंत एक्स्ट्रा फोर्स भेज दी। कुछ ही घंटों में एक पूरी प्लाटून (करीब 40 जवान) नाथू ला पहुंच गई। अब वहां करीब 350 जवान थे, जिन्हें सात अफसर लीड कर रहे थे। शाम ढलते-ढलते रणनीति तय हो चुकी थी। कंपनी कमांडर कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर ने साफ आदेश दिया- “कल सुबह 5 बजे से तारबंदी करने में और तेजी लानी होगी। कोई ढिलाई नहीं…।” 11 सितंबर, 1967 सुबह अंधेरा छंटते ही भारतीय जवान सीमा पर अपनी पोजीशन संभाल चुके थे। जैसे ही तार खिंचने लगे, चीनी सैनिक सामने आ गए। इस बार उनकी संख्या 10-11 के करीब थी। वो बातचीत का इशारा कर रहे थे। अतर सिंह ने पास खड़े कैप्टन डागर से कहा- “सर, इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।” कैप्टन ने नजरें सामने टिकाए रखते हुए जवाब दिया- “ध्यान रखा जाएगा। फिलहाल वो बातचीत के मूड में दिख रहे हैं।” बातचीत शुरू ही हुई थी कि अचानक पीछे से चीनी सैनिकों की एक और टुकड़ी निकल आई। बिना चेतावनी के हमला हुआ। अगले ही पल सीमा पर गोलियों की आवाज गूंजने लगी। भारतीय फौज पहले से तैयार थी। जवाबी फायरिंग भी शुरू हो गई। कुछ ही पलों में पूरा माहौल बदल गया। चाइनीज मशीन गन, लाइट गन और राइफलों से गोलियां बरसने लगीं। नजदीकी मोर्चों से मोर्टार दागे जाने लगे। नाथू ला की शांत पहाड़ियां गोलियों की आवाज से कांप उठीं। भारत के लिए अब ये झड़प नहीं, बल्कि सम्मान और संकल्प की खुली लड़ाई बन चुकी थी। तीन घंटे की भीषण लड़ाई के बाद हालात पूरी तरह बदल चुके थे। हालात इसलिए और भी कठिन थे, क्योंकि तब भारतीय फौज कई ‘ऊपरी आदेशों’ में जकड़ी हुई थी। सरकार की अनुमति के बिना आर्टिलरी (तोप) फायर नहीं खोला जा सकता था। हैवी मशीन गन चलाने के लिए आर्मी हेडक्वार्टर की इजाजत जरूरी थी। कड़े मुकाबले के बावजूद भारत को खासा नुकसान हुआ था। सेना के कैप्टन डागर समेत दो कंपनी कमांडर, चार सूबेदार और 83 जवान शहीद हो चुके थे। करीब 190 जवान गंभीर रूप से घायल थे। सीनियर अफसर के रूप में सिर्फ सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह ही बचे थे। कुल तीन महीने की सर्विस हुई थी। मोर्चे पर जो हालात थे, वो किसी अनुभवी अफसर तक को तोड़ने के लिए काफी था। 190 घायल जवानों की चीखें, दर्द से भरी पुकार…। वो 83 शहीद भी चुपचाप मौत की आगोश में नहीं गए थे। वो भी तड़पे थे, कराहे थे, आखिरी सांस तक लड़े थे। ये सब कुछ 800-900 गज के दायरे में हो रहा था। अब पूरी जिम्मेदारी सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह के कंधों पर थी। घायलों को सुरक्षित पीछे भेजना था, चीनी सेना को आगे बढ़ने से रोकना था। काउंटर फायर भी जारी रखना था। हालात बेहद खराब थे। रेडियो कनेक्टिविटी पूरी तरह टूट चुकी थी। आर्टिलरी ऑफिसर घायल होकर जमीन पर पड़े थे। मोर्टार सेक्शन के सूबेदार भी जख्मी थे। चारों तरफ सिर्फ गोलियों की आवाज थी, धुआं था और बीच में खड़ा था वो अफसर लगातार दुश्मन की गोलियों का जवाब दे रहा था। सुबह करीब 5:30 बजे शुरू हुई फायरिंग लगातार जारी रही। 11 बजे तक हालात और मुश्किल हो चुके थे। अतर सिंह के अलावा सिर्फ चार जवान बचे थे। सबसे बड़ी चुनौती थी कि किसी भी हाल में चीनी सेना को इसका अंदाजा न होने दिया जाए। दुश्मन को अगर भनक भी लगती कि भारतीय मोर्चे पर जवानों की संख्या बेहद कम हो चुकी है तो वो पूरे इलाके पर कब्जा कर लेता। अब ये लड़ाई सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि सूझबूझ, लीडरशिप और साहस की परीक्षा थी। सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह को इस बात का अंदाजा था। हालात काबू में करने के लिए उन्होंने एक तरकीब सोची। उन्होंने चारों जवानों को पास बुलाकर समझाया- “तुम सब अपनी पोजीशन से फायरिंग करोगे और फिर तुरंत दूसरी पोजीशन पर शिफ्ट हो जाओगे। हर बार जगह बदल-बदलकर फायर करना है।” एक पल रुककर अतर सिंह फिर बोले- “दुश्मन को ये लगना चाहिए कि यहां बहुत बड़ी संख्या में भारतीय जवान मौजूद हैं। उसे भ्रम में डालना है।” चारों जवान अपना काम समझ चुके थे। कुछ ही देर में अलग-अलग दिशाओं से फायरिंग होने लगी। दुश्मन को लगने लगा कि सामने बहुत बड़ी टुकड़ी तैनात है। चीनी सिपाही आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। फिर भी भारतीय मोर्चे पर हालात बहुत नाजुक थे। दोपहर के 2 बज चुके थे। अतर सिंह के साथ चार जवान डटे हुए थे। चीनी गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। इसी बीच एक सिग्नल ऑफिसर दौड़ता हुआ आया। उसने टूटी हुई टेलीफोन लाइन किसी तरह जोड़ दी थी। अतर सिंह ने बिना एक पल गंवाए कहा- “ब्रिगेड कमांडर से तुरंत बात कराओ।” दूसरी ओर से ब्रिगेडियर राय सिंह यादव की आवाज आई- “हां, बोलिए।” अतर सिंह बोले- “सर, मैं सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह बोल रहा हूं।” उधर से शांत और स्नेह भरी आवाज आई- “हां बेटे, बोलो…।” अतर सिंह ने उन्हें पूरी जानकारी दी। बॉर्डर के हालात, जवानों की स्थिति और लगातार हो रही फायरिंग… फोन के दूसरे सिरे से कुछ पल खामोशी छा गई। फिर भारी और भावुक आवाज गूंजी- “बेटे, मैं सब समझ रहा हूं, लेकिन किसी भी हाल में पोस्ट खाली मत करना। भारत मां की लाज रखना।” कमांडर की आवाज में दर्द था, चिंता थी और एक भरोसा भी। उन्होंने आगे कहा- “कुक, हाइजीन और एडमिनिस्ट्रेशन संभालने वाले अधिकारी तक को इस लड़ाई में झोंक दिया गया है।” कुछ देर बाद डिवीजन कमांडर मेजर जनरल सगत सिंह ने बात की। वो बोले- “बेटा, हालात मेरी समझ में आ चुके हैं। आर्टिलरी फायर की परमिशन मैं देता हूं। मेरी नौकरी जाती है तो जाए, कोर्ट मार्शल होता है तो हो जाए, लेकिन मैं इस तरह अपने जवानों को मरते नहीं देख सकता।” दोपहर दो बजे के बाद भारत सरकार की ऑफिशियल परमिशन के बिना आर्टिलरी फायर खोल दिया गया। तोपें गरजीं और दुश्मन पर गोले बरसने लगे। दुश्मन की फ्रंट लाइन टूट गई। एक-एक करके चीनी सैनिक मारे जाने लगे। दुश्मन पीछे जा चुका था। भारत को बढ़त मिल चुकी थी। करीब 450 चीनी सैनिक मारे गए। दुश्मन सेना पीछे हट गई। इस लड़ाई को लेकर काफी हंगामा मचा, लेकिन इस जीत ने 1962 की टीस को कुछ कम कर दिया था। अगले ही दिन यानी 12 सितंबर की सुबह डिवीजन कमांडर मेजर जनरल सगत सिंह ने सेकेंड लेफ्टिनेंट अतर सिंह को मिलने बुलाया। ये कोई ऑफिशियल मुलाकात नहीं, बल्कि एक सैनिक के साहस का सम्मान था। अतर सिंह को स्पेशल प्रमोशन देकर कैप्टन बना दिया गया। नॉर्मली ये प्रमोशन करीब 6 साल की सर्विस के बाद मिलता है। अब कहानी 1971 पाकिस्तान जंग की पाकिस्तान के साथ जंग शुरू हो चुकी थी। उस समय कैप्टन अतर सिंह बैंगलुरू में तैनात थे। उन्हें एक नई जिम्मेदारी के साथ राजस्थान में बाड़मेर बॉर्डर पर भेजा गया। एक ऐसा इलाका, जहां न पक्की सड़कें थीं, न पानी का पुख्ता इंतजाम। यहां जिंदगी बेहद मुश्किल थी। नाथू ला के मोर्चे पर कैप्टन अतर सिंह की लीडरशिप को देखते हुए उन्हें अहम जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें जंग लड़ रहे जवानों के लिए रसद और गोला-बारूद पहुंचाना था। भारतीय फौज का पूरा ध्यान पंजाब और पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मोर्चे पर था। राजस्थान में पाकिस्तान के साथ लगता करीब एक हजार किलोमीटर का बॉर्डर भी बेहद सेंसिटिव था। एक तरफ दुश्मन की हरकतें थीं, दूसरी तरफ रेगिस्तान की कठोर चुनौती। ऐसे में कैप्टन अतर सिंह और उनके साथियों के सामने एक और बड़ी परीक्षा खड़ी थी। भारतीय फौज लगातार आगे बढ़ रही थी और पाकिस्तान के इलाके में घुस चुकी थी। कैप्टन को अपने प्लाटून के साथ उन तक पहुंचना था। भारतीय हिस्से का आखिरी गांव मुनाबाव था। पाकिस्तान की तरफ का रास्ता जवानों को नहीं पता था। कैप्टन अतर सिंह बेस कैंप में बैठे कुछ काम निपटा रहे थे। तभी एक जवान आया और सैल्यूट करने के बाद बोला- “इंटेलिजेंस ने पाकिस्तान में एंट्री का रास्ता बताया है। हमें मुनाबाव उधर जाना है, आगे सिंध की बढ़ने पर पक्की सड़क मिलेगी।” सिंध पाकिस्तान का इलाका था। वहां भारतीय जवानों के जरूरत की चीजें पहुंचाने के लिए काफिला निकल पड़ा। कुछ किलोमीटर आगे रेगिस्तान की ओर चले ही थे कि पता चला पाकिस्तान के उस हिस्से में न सड़क है, न कोई पगडंडी। बस एक पुरानी रेलवे लाइन दिख रही थी। एक जवान ने कहा- “साब, यहां तो कुछ है ही नहीं। अंग्रेजों के जमाने का रेलवे ट्रैक है और चारो तरह सिर्फ रेत ही रेत…।” कैप्टन अतर सिंह ने दृढ़ आवाज़ में कहा- “तो क्या हुआ…? इसी रास्ते से जाएंगे।” दूसरा जवान हैरानी से बोला- “साब, हमारे पास 16 गाड़ियां हैं। ये रेगिस्तान में कैसे चलेंगी, फंस जाएंगी।” अतर सिंह ने कहा- “मैं देख रहा हूं, लेकिन मोर्चे पर जवानों को खाना-पानी, हथियार और गोला-बारूद पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। हालात जो भी हों हमें उन तक पहुंचना ही है।” पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। जवानों ने धीरे-धीरे गाड़ियों को धक्का देकर आगे बढ़ाना शुरू किया। गोला-बारूद और रसद से भरी गाड़ियों के पहियों के नीचे लोहे की लंबी-लंबी चादरें बिछाई (सैंड चेन) जातीं। एक गाड़ी निकाली जाती, फिर वही सैंड चेन दूसरी गाड़ी के नीचे डाली जाती। लगातार 28 घंटे की मेहनत के बाद 8 किलोमीटर का रेतीला रास्ता पार करके जरूरी साजो-सामान भारतीय जवानों तक पहुंचाया गया। पानी के लिए एक छोटी गाड़ी में तिरपाल बिछाकर टंकी बनाई गई। इतने कठिन हालातों में लड़ते हुए भी भारतीय सेना पाकिस्तान के 78 किलोमीटर अंदर तक घुस गई। एक सुबह ऐसी आई, जब सामने पाकिस्तान के मैदान और आबादी नजर आने लगी। यहीं अंतिम हमला होना था। वहां पहुंचने पर खबर मिली कि पास की एक पलटन को दो दिन से खाना-पानी नहीं मिला है। प्लाटून कमांडर ने अतर सिंह से बात की। कैप्टन अतर सिंह ने बिना हिचक जवाब दिया- “आप चिंता मत करिए। मेरे 16 ऊंट खाने के साथ रास्ते में हैं। मैं उन्हें तुरंत डायवर्ट कर रहा हूं।” रेगिस्तान में हालात खराब थे। जवानों को 24 घंटे के लिए सिर्फ 1 लीटर पानी मिलता था। 15 दिन में एक बार नहाने का मौका मिलता। नहाने के लिए 2-2 फीट के गड्ढे बनाए जाते और जो पानी गिरता, उसी से कपड़े धोए जाते। प्यास लगने पर जवान बोतल खोलते, दो उंगलियां पानी में डुबोते और होंठों पर लगा लेते, क्योंकि इमरजेंसी के लिए पानी बचाकर रखना होता था। इन्हीं हालात में भारतीय सेना ने कई महीने काटे, मोर्चा संभाला और साबित कर दिया कि हथियारों से जंग लड़ने से पहले हौसले और सूझबूझ से भी लड़ा जाता है। जब पूरी पलटन बाल-बाल बची वो रात किसी भी दूसरी रात जैसी नहीं थी। कैप्टन अतर सिंह अपनी पलटन को लेकर रसद और हथियारों के साथ आगे बढ़ रहे थे। खुला रेगिस्तान खामोशी के साथ और ज्यादा खतरनाक हो चला था। दुश्मन के इलाके में गाड़ियों की लाइट जलाने का सवाल ही नहीं था। सभी वाहन बिना रोशनी के बेहद धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रहे थे। अचानक एक जगह हल्की-सी हलचल नजर आई। अतर सिंह चौकन्ने हो गए। उन्होंने फौरन रुकने का आदेश दिया। काफिला रुक गया। पलटन वहीं जम गई। करीब 400-500 गज दूर से एक भारी आवाज गूंजी- “टैरट डाउन, फायर…” टैरट यानी टैंक से गोले दागने वाली नली। टैरट ऊपर हो तो गोला दूर तक जाता है, नीचे हो तो नजदीक। कमांडर ने उसे नीचे करके गोला दागने का आदेश दिया था। मतलब साफ था, कैप्टन अतर सिंह का काफिला टैंकों के ठीक सामने था। मौत सामने खड़ी थी, लेकिन अतर सिंह ने गौर किया कि इस कमांडर की आवाज पहले भी कहीं सुनी है। एक नाम उनके दिमाग में कौंधा, उन्होंने पूरी ताकत से वो नाम पुकारा- “आर यू मेजर आर.डी. लॉ?” एक सतर्क आवाज तुरंत उधर से आई- “यस…! हू इज देयर…?” कैप्टन अतर सिंह ने बेहिचक जवाब दिया- “मेजर मैं अतर सिंह, आपका चेला…। इंडियन मिलिट्री एकेडमी से…।” एक पल का सन्नाटा। फिर अचानक आदेश गूंजा- “स्टॉप फायर, स्टॉप फायर, स्टॉप फायर…!” टैंक फायर के लिए पूरी तरह तैयार थे, लेकिन उससे पहले ही रोक दिए गए। 500 गज की दूरी से आठ टैंक फायर झोंकते तो पूरा काफिला राख हो जाता। कुछ देर बाद मेजर आर.डी. लॉ खुद कुछ आगे आए। एक-दूसरे को कोडवर्ड पास किया। तब पता चला, वो टैंक आगे होने वाले हमले में मदद के लिए बढ़ रहे थे। उस रात अंधेरे में रेगिस्तान की जमीन पर एक जानी-पहचानी आवाज ने पूरी पलटन की जान बचा ली। 32 साल सेना में सर्विस देने के बाद अतर सिंह 1992 में कर्नल की रैंक से रिटायर हो गए *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार *** कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ——————————————————— सीरीज की ये स्टोरी भी पढ़ें… घायल होने के बावजूद मोर्चे पर लौटे, दुश्मन से 2 गांव छीने; आगरा के कैप्टन सोढ़ी की कहानी आगरा के रहने वाले कैप्टन रणवीर सिंह सोढ़ी पंजाब के फाजिल्का सेक्टर में तैनात थे। सिर्फ 24 साल की उम्र में आर्मी की तोपखाना रेजिमेंट में कैप्टन के तौर पर अहम जिम्मेदारी निभा रहे थे। मोर्चे पर तैनात जवानों को आगे बढ़ने के लिए पीछे से आर्टिलरी सपोर्ट देना काफी पेचीदा काम था। पूरी स्टोरी पढ़ें…