कई लोग रमज़ान के महीने में रोज़ेदार इबादत के साथ-साथ अपनी रोज़मर्रा की जिम्मेदारियां भी पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। इसी कड़ी में मेरठ की रहने वाली ईशा खान रोज़ा रखकर नियमित रूप से अपना फील्ड वर्क कर रही हैं और इसे अपनी इबादत का ही हिस्सा मानती हैं। ईशा खान का कहना है कि रोज़ा केवल भूखा-प्यासा रहना नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा के लिए किया जाने वाला एक पवित्र अमल है। वह सुबह सहरी करने के बाद पूरे दिन फील्ड में काम करती हैं और अपने दायित्वों को पूरी ईमानदारी से निभाती हैं। उन्होंने कहा, “हम रोज़ा सिर्फ अपने अल्लाह की रज़ा के लिए रखते हैं। बाहर फील्ड का काम भी पूरी जिम्मेदारी से करते हैं। अगर ईमान मजबूत हो तो अल्लाह खुद ही सब्र दे देते हैं। रोज़ा हमें हर हाल में शुक्र अदा करना और इबादत में लगे रहना सिखाता है।” ईशा के अनुसार रोज़ा इंसान को आत्मसंयम, अनुशासन और धैर्य की सीख देता है। काम के दौरान थकान महसूस होती है, लेकिन नीयत मजबूत हो तो मुश्किलें आसान लगती हैं। उनका मानना है कि रोज़ा रखने से व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव आता है। “हम कोशिश करते हैं कि किसी से ऊंची आवाज़ में बात न करें, गुस्सा न करें और अपना काम ईमानदारी से करें। रोज़ा इंसानियत और सब्र का पैगाम देता है।” विशेषज्ञों का कहना है कि रोज़ा रखने वाले कामकाजी लोगों को सहरी में पौष्टिक आहार लेना चाहिए और इफ्तार के बाद पर्याप्त पानी पीना चाहिए, ताकि दिनभर ऊर्जा बनी रहे और कमजोरी महसूस न हो। रमज़ान के इस पवित्र महीने में ईशा खान जैसी कई महिलाएं और पुरुष रोज़ा रखकर अपने पेशेवर दायित्वों को निभा रहे हैं। उनका मानना है कि जब नीयत साफ और ईमान मजबूत हो, तो अल्लाह खुद हिम्मत और सब्र अता करता है। रोज़ा उनके लिए केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, अनुशासन और समर्पण की मिसाल है।