लखनऊ के अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में अनादि सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं सामाजिक संस्था ने हास्य-व्यंग्य नाटक ‘तिल का ताड़’ का मंचन किया। शंकर शेष द्वारा लिखित और मुन्नी देवी द्वारा निर्देशित इस नाटक ने दर्शकों को मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी दिया। नाटक की कहानी कुँवारों की आवासीय समस्या पर केंद्रित है। इसमें नायक प्राणनाथ मकान मालिक से अपनी शादीशुदा होने का झूठ बोलकर किराए पर रहता है। जब मकान मालिक पत्नी को बुलाने की शर्त रखता है, तो प्राणनाथ अपने दोस्त से मदद मांगता है। हर कुँवारा व्यक्ति चरित्रहीन नहीं होता इसी बीच, गुंडों से परेशान मंजू नाम की एक महिला को वह अपने घर लाता है। परिस्थितियों के चलते प्राणनाथ उसे अपनी पत्नी बनकर रहने के लिए राजी कर लेता है, जिससे झूठ का सिलसिला शुरू हो जाता है।झूठ को छिपाने के लिए एक के बाद एक कई झूठ बोले जाते हैं। प्राणनाथ का ब्रह्मचारी दोस्त इस स्थिति को समझ जाता है और सच्चाई उजागर करने का प्रयास करता है।हालात तब और जटिल हो जाते हैं जब प्राणनाथ की प्रेमिका और दोनों के पिता अचानक वहाँ पहुँच जाते हैं। नाटक के अंत में मंजू स्वयं सामने आकर अपनी सच्चाई बताती है। उसका दोस्त अजय भी वहाँ पहुँचकर स्पष्ट करता है कि मंजू उसकी पत्नी है। इससे सभी शंकाएँ दूर हो जाती हैं और प्राणनाथ की शादी के लिए सहमति बन जाती है। यह नाटक समाज को संदेश देता है कि हर कुँवारा व्यक्ति चरित्रहीन नहीं होता, इसलिए लोगों को पूर्वाग्रहों से बचना चाहिए। ये कलाकारों ने किरदार निभाया मंच पर संदीप देव, मुकुल चौहान, कोमल प्रजापति, गुरुदत्त पांडेय, अनिल कुमार, योगेंद्र यादव, उज्जवल सिंह, अंशिका सक्सेना और निरुपमा राहुल ने सशक्त अभिनय किया। प्रकाश व्यवस्था तमाल बोस, ध्वनि संयोजन आदित्य कुमार शर्मा और मुखसज्जा राज किशोर गुप्ता की पात्रानुरूप रही, जिसकी दर्शकों ने सराहना की।