लखनऊ में भारतीय ज्ञान-परम्परा पर विचार मंथन:कुमार स्वामी फाउण्डेशन ने भातखण्डे विश्वविद्यालय में व्याख्यान आयोजित किया

राजधानी लखनऊ में भारतीय ज्ञान-परम्परा पर विचार मंथन किया गया। कुमारस्वामी फाउण्डेशन के सहयोग से भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय स्थित जयशंकर प्रसाद सभागार में बीसवां पं. भुवनेशचन्द्र मिश्र स्मृति व्याख्यान आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम में विषय के विशेषज्ञों ने भारतीय जीवन-दर्शन की व्यापकता और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे। मुख्य वक्ता प्रोफेसर रामनाथ झा ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा एक सर्वांगपूर्ण जीवन-विधान है। यह केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार में भी झलकती है। उन्होंने जोर दिया कि मन, वचन और कर्म की एकता को जीवन का मूल आधार माना गया है, और इस एकता का टूटना ही पाखंड है। आत्म-बोध का प्रश्न ही भारत का निर्णायक प्रश्न रहा प्रोफेसर झा ने भारतीय सभ्यता को जिज्ञासामूलक सभ्यता बताया। उन्होंने कहा कि आत्म-बोध का प्रश्न ही भारत का निर्णायक प्रश्न रहा है, जिसे भारत-बोध भी कहा गया है।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़े प्रो. झा ने आगे कहा कि आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में यही भारत-बोध प्रकाशित होता है। उन्होंने शिक्षा, समाज, अर्थ-व्यवस्था और राजनीति को एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ बताया। उनके अनुसार, भारतीय व्यवस्था को समृद्ध बनाने में बौद्ध, जैन, लोकायत और लोक-परम्पराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अंतर्विरोधी मान्यताओं ने समाज में संकट पैदा किए कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर आर.के मिश्र ने आधुनिक सभ्यता के व्यापक प्रभाव पर बात की। उन्होंने कहा कि इसकी अंतर्विरोधी मान्यताओं ने समाज में विघटन, अर्थव्यवस्था में लोभ और राजनीति में अविश्वसनीयता जैसे संकट पैदा किए हैं। प्रोफेसर मिश्र ने अकादमिक जगत की जिम्मेदारी बताई कि वह इन चुनौतियों का समाधान खोजे। इस अवसर पर फाउंडेशन की वार्षिक पत्रिका ‘तत्त्व-सिन्धु’ के नए अंक का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में शहर के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी और गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में मौजूद रहे। डॉ. बृजेन्द्र पाण्डेय ने कार्यक्रम का संचालन किया।