आशा वर्कर की नौकरी के चलते अपनी सगी बेटी के बच्चे को खो दिया। मेरे पास दूसरी महिला की प्रसव पीड़ा की सूचना आई थी। मेरी बेटी भी गर्भवती थी। उसकी तबीयत खराब थी। उसको छोड़कर मैं दूसरी महिला का प्रसव कराने गई। इधर मेरी बेटी घर पर अकेली थी। उसकी डिलीवरी सही समय पर नहीं हो पाई। बच्चे की मौत हो गई। नौकरी के लिए हम अपना सुख चैन गंवा रहे हैं। 24 घंटा काम करने पर भी हमें 3500 रुपए महीना मानदेय मिलता है। परिवार चलाना मुश्किल है। हम लोगों ने अपनी समस्या हर अधिकारी-कर्मचारी, नेता-मंत्री को बताई है, लेकिन इसके बाद भी सरकार की आंखें नहीं खुल रही हैं। यह कहना है आशा वर्कर शोभा देवी का जो अमेठी से लखनऊ प्रदर्शन में हिस्सा लेने आई थीं। लखनऊ समेत प्रदेश की लगभग 1 लाख 70 हजार आशा वर्कर्स विभिन्न मांगों को लेकर लगातार आंदोलन कर रही हैं। इसीक्रम में मंगलवार को हजरतगंज में प्रदर्शन किया गया। मांगे पूरी न होने से नाराज आशा बहू का कहना है कि जल्द ही हड़ताल पर जाएंगे। दैनिक भास्कर रिपोर्टर ने आशा वर्कर से बातचीत की। पढ़िए रिपोर्ट… केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी स्वास्थ्य योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने में आशा वर्कर सबसे अहम योगदान निभाती हैं। इनको स्वास्थ्य विभाग की रीड की हड्डी कहा जाता है। आशा बहुओं (आशा वर्कर) ने कोरोना काल में अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर लोगों की जान बचाई। मगर मानदेय और सम्मान के नाम पर मात्र ₹2000 से ₹3500 मिलते हैं। अब पढ़िए आशा वर्कर ने जो कहा… 3 साल तक नहीं मिला पैसा महाराजगंज की आशा वर्कर रीना सिंह ने बताया- साल 2006 से सेवाएं दे रही हैं। नियुक्ति के बाद 3 साल तक कोई भी मानदेय नहीं मिला। मुफ्त काम किया। साल 2009 में जब पोलियो पिलाना शुरू किया तो 75 रुपए मिलने लगा। अभी तक 75 रुपए मिल रहा है। तमाम काम के बाद महीने का ₹3500 मिलता है। इतने कम पैसों में ना तो महीने भर का राशन ले पाते हैं। ना बच्चों का दवा इलाज और पढ़ाई करवा पा रहे हैं। चंदा करके करवाया अंतिम संस्कार शोभा शर्मा ने कहा- कोरोना में जब सभी लोग अपने घरों में थे तब हम घर के बाहर लोगों की सेवा कर रहे थे। मरीजों की जान बचा रहे थे। कहीं आने-जाने का भत्ता नहीं मिलता है। स्मार्टफोन मिला था अब उसके रिचार्ज के पैसे भी मिलना बंद हो गया। फोन खराब हो जाता है तो हम लोग अपने पैसे से बनवाते हैं। हमारे साथी आशा वर्कर लक्ष्मी के पति बीमार पड़ गए। हमने चंदा लगाकर उनका इलाज करवाया। जब मृत्यु हुई तो अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे। उसके लिए भी चंदा करना पड़ा। इतनी परेशानियां है कि गिना नहीं सकते। मगर सरकार है कि कुछ भी सुनने को तैयार नहीं। परिवार बच्चों का जीवन बर्बाद सुल्तानपुर की कुसुम लता ने बताया- विगत 20 सालों से आशा वर्कर के रूप में काम कर रहे हैं। इन सालों में ना तो वेतन में कोई बदलाव आया। ना जीवन में। यूं समझ लीजिए कि हमारी जिंदगियां बर्बाद हैं। हमारे साथ बच्चों और परिवार का भविष्य भी बर्बाद है। कोई आशा कितना भी कोशिश करले मगर अपने बच्चों को डीएम-एसपी नहीं बना सकती। क्योंकि पढ़ाने के लिए पैसे ही नहीं है। जब हमारी शुरुआत में भर्ती हुई थी तो जच्चा बच्चा कि सुरक्षा के साथ 6 काम बताए गए थे। मगर आज हालात यह है कि गांव में आग भी लगती है तो सबसे पहले हमें बुलाया जाता है। 50 से अधिक काम लिए जा रहे हैं। काम के बाद सरकार ने दिखाया ठेंगा उन्होंने कहा- हम हार मानने वाले नहीं हैं। योगी जी को गोरखपुर में घेरेंगे। अपना अधिकार लेंगे। न जाने कितनी आशाओं के साथ रेप हुई हत्या हो गई। मगर कोई आवाज उठाने वाला नहीं है। हमने जन-जन तक आयुष्मान कार्ड पहुंचा दिया। बदले में हमें सरकार ने ठेंगा दिखा दिया। हम अपने अधिकारों के लिए जान दे देंगे। मगर पीछे नहीं हटेंगे।